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समाज व्यवस्था
अखण्ड समाज दश सोपानीय व्यवस्था है, यही जागृत मानव परंपरा सहज वैभव है। समाज तीन रूपों में गण्य हैं :-
समाज का प्राथमिक रूप : समझदार परिवार
समाज का द्वितीय रूप : अखण्ड समाज (राष्ट्र)
समाज का तृतीय रूप : मानव (पृथ्वी) अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था
“सभी संस्थाएं अखण्ड समाज के अर्थ में है।” परिवार ही अखण्ड समाज के अर्थ में प्राथमिक घटक है। इस स्थिति में मुख्यत: सहअस्तित्व का प्रयोग प्रमाण होता है। ऐसे अनेक परिवार मिलकर सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी करते है। ऐसी भागीदारी स्वयं संस्थाओं के रूप में गण्य होता है। इसी क्रम में अर्थात् समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने के क्रम में विश्व परिवार सभा पर्यन्त भागीदारी सम्पन्न होता है।
भ्रमित परिवार किसी सीमावर्ती भूमि पर ही रहता है इसी प्रकार अनेक भ्रमित परिवारों में भी इसी पद्धति से भूमि की सीमा बनती है। भय, संत्रास सहित संस्था युद्ध बल संचय करने में विवश होता है। ऐसी प्रत्येक संस्था के मूल में लक्ष्य के प्रति जो कार्यक्रम है वही उसका मूल विचार हो जाता है क्योंकि भ्रमित लक्ष्य सार्थक होना नहीं होता है। इस प्रकार संस्था का मूल रूप विकृत और असफल ही होता है। ऐसे कार्यक्रम को तंत्रित करने के लिए भ्रमित मानव विवश होता है। फलत: पद और पदाधिकारियों की अनिवार्यता निर्मित होती है।
भ्रमित संस्था के प्रथम एवं द्वितीयावस्था में समर शक्ति संचयता की आवश्यकता समान है क्योंकि राज्य संस्थाएं अनेक हुई हैं।
प्रत्येक संस्था प्रभुत्ता एवं उसकी अक्षुण्णता के प्रति जनजाति को आश्वस्त एवं विश्वस्त होने के योग्य घोषणा बारंबार करती है क्योंकि सबका मूल उद्देश्य यही है। इस तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि राज्य संस्थाएं अखण्ड समाज में, से, के लिए समर्पित होने के लिए बाध्य है। जागृत मानव परंपरा में सम्यकता को स्थापित करना एवं संरक्षित करना ही उद्देश्य, कार्यक्रम, अध्ययन