19.
आचरणपूर्णता पर्यन्त शिक्षा में गुणात्मक परिवर्तन का अभाव नहीं है।
जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति ही अध्ययन के लिये वस्तु व विषय सर्वस्व है। सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति सहज ज्ञान एवं अनुभूति ही प्रसिद्ध है। यह ज्ञान मानव में भ्रम पर्यन्त संभव नहीं है। मानव प्रकृति में जागृति ही (निर्भ्रमता)। विकास एवं जागृति के क्रम में पाई जाने वाली चारों अवस्थाओं, तीनों चक्रों एवं भ्रम मुक्ति की व्याख्या, विश्लेषण एवं प्रमाण है। यही दर्शन सर्वस्व है। दर्शन विहीन जीवन में गुणात्मक परिवर्तन सम्भव नहीं है। प्रत्येक मानव विकास के लिये ही प्रत्याशु है क्योंकि जन्म से ही मानव सत्यवक्ता, न्याय पाने का इच्छुक एवं सही कार्य व्यवहार करने का इच्छुक है।
दर्शक ही दृश्य का दृष्टि के द्वारा दर्शन करता है। दर्शक, दृश्य और दृष्टि क्रिया ही है। प्रत्येक क्रिया संवेदना एवं गति का संयुक्त रूप है, जो कम्पनात्मक एवं वर्तुलात्मक गति के रूप में दृष्टव्य है। कम्पनात्मक गति ही संवेदनशीलता है। यही स्पन्दनशीलता भी है। संवेदन विहीन चैतन्य क्रिया नहीं है। संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति चैतन्य प्रकृति में ही आरंभ होती है और जागृत मानव परंपरा में ही संज्ञानशीलता सफल होता है। जबकि कम्पनात्मक गति जड़ प्रकृति में भी आंशिक रूप में पायी जाती है। जड़ प्रकृति में जो कम्पनात्मक गति है वह उसकी वर्तुलात्मक गति की अपेक्षा ऋणस्थ है। इसी कारणवश जड़ प्रकृति में वर्तुलात्मक गति प्रधानत: गणनीय है। कपन विहीन इकाई नहीं है।
स्पन्दन ही अग्रिम विकास के लिये तृषाभिव्यक्ति है। यही प्रत्येक अवस्था में स्वभाव है। “स्वभाव परिवर्तन ही मूल्य परिवर्तन है।” गुणात्मक मूल्य परिवर्तन ही विकास अर्थात् जागृति है। यही स्पंदनशीलता का क्रम है। कम्पनात्मक एवं वर्तुलात्मक गति का योगफल ही क्षमता है। क्षमता ही संस्कारपूर्वक स्वभाव में अभिव्यक्त होती है। अभिव्यक्ति की विविधता ही गुणात्मक परिवर्तन के लिए भी सहायक है। इसी क्रम में मानव न्याय प्रदायी धर्मीयता को प्रसारित करता है। यही अन्य मानवों पर स्थापित होने वाला प्रभाव है। स्थापित मूल्यों का शिष्ट मूल्यों सहित निर्वाह करने की क्षमता ही न्याय प्रदायी धर्मीयता का प्रसारण है जिसके लिये निपुणता, कुशलता और पाण्डित्य है।