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भोगों में संयमता से अभयता पूर्ण जीवन प्रत्यक्ष होता है।
मानव में भोगवादी प्रवृत्तियों को न्यायवादी प्रवृत्ति में परिवर्तन के बिना अखण्ड सामाजिकता एवं अभयता सर्वसुलभ नहीं है। मानवीयता पूर्ण जीवन के लिए समुचित कार्यक्रम का पाँचों स्थितियों में दश सोपानीय व्यवस्था में क्रियान्वयन होना ही अखण्ड सामाजिकता है, यही मानव का वैभव है। वैभव ही त्राण, प्राण एवं प्रेरणा है। यही परंपरा, प्रमाण एवं इतिहास है। वर्तमान में वैभव आगत के लिए योजना भी है। यही परंपरा की तारतम्यता है। मानव में निहित अमानवीयता का भय ही अखण्डता के लिये घातक है। जीवन परम्परा वास्तविकता के आधार पर गुणात्मक परिवर्तन एवं उसकी निरंतरता को सिद्ध करती है। जीवन समग्र के लिए ही कार्यक्रम है। यही धार्मिक, आर्थिक एवं राज्यनीति को उद्गमित एवं प्रमाणित करता है। समाधान एवं अनुभूति के लिए शिक्षा प्रणाली, पद्धति एवं नीति का निर्धारण चेतना विकास मूल्य शिक्षा से ही है। व्यवहार एवं व्यवसाय के लिए विधि एवं व्यवस्था की स्थापना है। शिक्षा में अनुभव एवं समाधान प्रदान करने योग्य वस्तु की न्यूनता ही कार्यक्रम की समग्रता में अपूर्णता है। यही अपूर्णता व्यक्तिगत निर्णय लेने के लिए स्थली है। यही संस्कृति एवं सभ्यता में उत्पन्न विविधता है। मानव की परस्परता में विपरीतता संघर्ष का कारण होती है। संघर्ष अखण्डता का द्योतक नहीं है। अखण्डता केवल निर्णय, निश्चय, प्रमाण एवं इनकी परंपरा है। मानवीयता पूर्ण आचरण एवं व्यवहार का अध्ययन ही अनुभव एवं समाधान है। अनुभव एवं समाधान से ही व्यवहार एवं व्यवसाय का संपन्न होना प्रसिद्ध है। इस तथ्य से यह निर्णय होता है कि समाज एवं सामाजिकता के बिना स्थापित संबंध, स्थापित संबंध के बिना स्थापित मूल्यानुभूति, स्थापित मूल्यानुभूति के बिना शिष्ट मूल्य का प्रकटन, शिष्ट मूल्य प्रकटन के बिना वस्तु मूल्य का नियंत्रण, वस्तु मूल्य के नियंत्रण के बिना सामाजिक लक्ष्य एवं कार्यक्रम सिद्धि, सामाजिक लक्ष्य एवं कार्यक्रम सिद्धि के बिना मानवीय संस्कृति एवं सभ्यता, मानवीय संस्कृति एवं सभ्यता के बिना प्रबुद्धता, प्रबुद्धता के बिना विधि व्यवस्था, विधि व्यवस्था के बिना अभयता, अभयता के बिना अखण्डता, अखण्डता के बिना स्थापित संबंधों में अक्षुण्णता, स्थापित संबंधों में अक्षुण्णता के बिना अखण्ड