28.
जिज्ञासात्मकता सुखी होने के अर्थ में एवं आवेशात्मक क्रियाकलाप के फलस्वरूप पीड़ाएं प्रसिद्ध हैं।
अज्ञात और अप्राप्त के प्रति जिज्ञासायें हैं। जिज्ञासात्मक आवश्यकता ही अनुसंधान की उत्प्रेरणा है। आवेशात्मक पीड़ा सम्मोहन व विरोध के रूप में है जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य मूलक है। काम, मद, मोह, लोभ सम्मोहनात्मक ; क्रोध व मार्त्स्य विरोधात्मक हैं। औचित्यता के संदर्भ में अनौचित्यता के प्रति प्रतिकारात्मक आवेश का होना पाया जाता हैं औचित्यता एवं अनौचित्यता मानवीयता पूर्वक नियम त्रय के रूप में निर्धारित हुई हैं।
औचित्यता के प्रति स्वीकृति - | विकास, गुणात्मक परिवर्तन, परिवर्तन के लिए जिज्ञासा की संभावना |
औचित्यता की अस्वीकृति में पीड़ा - (समाधान की जिज्ञासा) | ह्रास, ऋणात्मक, गुणात्मक परिवर्तन की संभावना |
अनौचित्यता की अस्वीकृति ही - औचित्यता की अपेक्षा | विकास, गुणात्मक परिवर्तन की संभावना |
अनौचित्यता की स्वीकृति पीड़ा - | ह्रास, ऋणात्मक परिवर्तन की संभावना और अपराध प्रवृत्ति |
गुणात्मक परिवर्तन ही धनात्मक परिवर्तन है। जागृति ही धनात्मक परिवर्तन है। जागृति पूर्णता में, से, के लिए ही है। प्रत्येक मानव पूर्णता से सम्पन्न होना चाहता है। मानव में, से, के लिए पूर्णता केवल क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता ही है। अनुचित अर्थात् अमानवीयतावादी पद्धति व प्रक्रिया से पूर्णता सिद्ध नहीं हुई है। प्रत्येक मानव जन्म से वर्ग विहीन है, समुदाय विहीन है, सम्प्रदाय विहीन है, साथ ही उसमें सफलता एवं पूर्णता से सम्पन्न होने की पीड़ा समाहित रहती है। पीड़ा के बिना संक्रमण व्यतिक्रमण (ह्रास) सिद्ध नहीं हुआ है। सम्यकता की ओर प्रवेश ही संक्रमण है। लक्ष्य के विपरीत दिशा में गति ही व्यतिक्रमण है। कोई मानव अनौचित्य और