45.
आवेश (लाभोन्माद, भोगोन्माद, कामोन्माद) मानव की स्वभाव गति नहीं है।
आवेशित गति एवं स्वभाव गति प्रसिद्ध है। चैतन्य क्रिया में स्वभाव गति पूर्वक ही गुणात्मक परिवर्तन होता है। प्रत्येक घटना अपनी स्थिति को प्रकट करती है। संपूर्ण प्रकटन आवेशित गति एवं स्वभाव गति के रूप में दृष्टव्य है। आवेश के लिए अन्य का आक्रमण होना आवश्यक है। मानव को सफलता के लिए स्वभाव गति में ही रहना अनिवार्य है। इसके लिए व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रक्रिया प्रसिद्ध है। व्यक्ति ने अनावश्यक वातावरण से निष्प्रभावित रहने का प्रयास किया है। ऐसा प्रयास साधारण कठोर एवं कठोरतम पद्धतियों से सम्पन्न किया जाना हुआ है। इन सबका उद्देश्य उनके लक्ष्य के विपरीत प्रभावदायी तत्वों से निष्प्रभावित होना और अभीष्ट को पाना रहा है। फलत: व्यक्तिगत रूप में गुणात्मक परिवर्तन होना रहा है। वह लोक सामान्य नहीं होने के कारण आदर्श में गण्य रहा है। इसी कारणवश मानव में जागृति का प्रमाण चेतना विकास मूल्य शिक्षा व दश सोपानीय व्यवस्था पद्धति में पूर्णता को प्रदान करने में समर्थ नहीं हुआ अथवा उस समय के लिए आवश्यकता नहीं रही। आवश्यकता के बिना उपलब्धि का लक्ष्य एवं उसके लिए विधिवत् प्रयास नहीं है। वर्तमान में वास्तविकता मानवता की सर्वसुलभता के लिए अनिवार्यता को स्पष्ट कर रही है। यही सत्यता मानव को आवेशमय अमानवीयतावादी जीवन से संक्रमित होकर मानवीयता पूर्ण जीवन में सर्वतोमुखी कार्यक्रम को प्रसूत करने के लिए बाध्य की है। आवेश जीवन का लक्ष्य या गुणात्मक परिवर्तन के लिए सहायक या समाज के लिए उपादेयी सिद्ध नहीं हुआ है। जड़ प्रकृति में आवेशित गति पाँच प्रकार की शक्ति के रूप में गण्य है साथ ही उसकी सामान्य एवं आवेशित गति के योगफल में उसमें धन-ऋणात्मक परिणाम स्पष्ट है। चैतन्य प्रकृति में मूल प्रवृत्तियों का ऋणात्मक-धनात्मक परिवर्तन होना, वृत्तियों का ऋणात्मक-धनात्मक परिमार्जन होना पाया जाता है। गठनपूर्णता तक परिणाम, क्रियापूर्णता तक गुणात्मक परिवर्तन एवं आचरणपूर्णता तक प्रवृत्तियों में परिमार्जन प्रसिद्ध है। मूल प्रवृत्तियाँ हर्ष एवं क्लेश परिपाकात्मक श्रृंखला में स्पष्ट है। क्लेश परिपाकात्मक मूल प्रवृत्तियाँ हर्ष परिपाकात्मक प्रवृत्तियों में परिवर्तित होती हैं। यह एक वास्तविकता है। मानव में क्लेश स्वीकार्य