25.
आवेश मानव का अभीष्ट नहीं है।
आवेश विकास एवं जागृति के क्रम में सहायक नहीं है। यही सत्यता मानव के आवेश से मुक्ति पाने के लिए बाध्यता है। इसी बाध्यता ने आवेश के मूल तत्वों और उनके परिहार का अन्वेषण करने के लिए प्रयोग, अभ्यास, व्यवहार, उत्पादन करने के लिए प्रवृत्त किया है। यही क्रम अपने में एक इतिहास है। सुदूरकाल का इतिहास, अनन्त काल की प्रक्रियाएं क्रम से विकास के रूप में प्रत्यक्ष है। यह प्रत्यक्षता ही प्रकृति का एक इतिहास है। इसी इतिहास की एक श्रृंखला में मानव एक उपलब्धि है। मानव में पायी जाने वाली स्वतंत्रता की तृषा का तृप्त हो जाना ही मानव जीवन में दृष्टा पद प्रतिष्ठा एवं जागृति है। मानव जीवन में ही जागृति का क्रम है। स्वतंत्रता का प्रत्यक्ष रूप ही सतर्कता एवं सजगता है जो मानवीयतापूर्ण समाज, सामाजिकता, आचरण, संस्कृति, विधि, व्यवस्था एवं शिक्षा है। ये सभी परस्पर पूरक तथ्य हैं। इन सभी पूरक तथ्यों का एक ही सुदृढ़ आधार है मानवीयता। मानवीयतापूर्ण जीवन में ही मानव के विचार, व्यवहार एवं अनुभूति में एकात्मकता सिद्ध होता है। अनुभूति के विपरीत विचार, व्यवहार एवं उत्पादन होना ही अनेकता है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन पूर्वक वस्तु विनिमय एवं व्यवस्था; मूल्यों का निर्वाह पूर्वक व्यवहार एवं विधि; कुशलता, निपुणता एवं पाण्डित्य पूर्ण विचार तथा मूल्यत्रय के अनुभव की निरंतरता से जीवन चरितार्थ होता है। यही जीवन में समाधान है। यही मानवीयता पूर्ण जीवन जागृति सहज प्रमाण है। समस्या मानव का अभीष्ट नहीं है या उपलब्धि नहीं है। समाधान ही मनुष्य का आद्यान्त इष्ट, अभीष्ट एवं उपलब्धि है। यह केवल चारों आयामों दश सोपानीय परिवार सभा व्यवस्था एकसूत्रता है, जिसके लिए अनवरत अभ्यास है।
“सतर्कता एवं सजगता पर्यन्त उदय क्रम है अर्थात् अनुमान का अभाव नहीं है।” अनुमान ही अनुगमन, आचरण, अनुसंधान, प्रयोग, उत्पादन एवं व्यवहार की प्रवृत्ति है। अनुमान ही अग्रिम गति का प्रेरणा स्रोत है। अनुक्रम पूर्वक प्रमाणित करने के लिए प्रयासोदय ही अनुमान है। आनुषंगिक क्रम ही अनुक्रम है। आनुषंगिक क्रम सुदूर इतिहास से सम्बद्ध व विकास एवं जागृति से सम्बद्ध पाया जाता है। इसलिये प्रत्येक प्रामाणीकरण जागृति की श्रृंखला में ही सिद्ध होता है ऐसी प्रमाणिकता “प्रमाण त्रय” के रूप में मानव जीवन में चरितार्थ होती है। विकास क्रम व