52.
अमानवीयता से ग्रसित वर्ग संघर्ष की सीमा में प्रलोभन व भय का अभाव नहीं है।
भय मुक्ति के बिना आश्वस्त होना संभव नहीं है। अभ्यास के लिए आश्वस्त एवं विश्वस्त होना आवश्यक है। उससे अर्थात् भय से मुक्त होने के लिए प्रचलित वैयक्तिक सीमा में साधना व अभ्यास हुआ है। ऐसे वातावरण में किया गया सफल अभ्यास ही आदर्श के रूप में गण्य है। संपूर्ण आदर्श आचरण योग्य है ही। आचरण योग्य न होने की स्थिति में वह आदर्श नहीं है। आचरण में आया हुआ दर्शन ही जीना होता है। अन्य जो आचरण योग्य शेष हैं वे सब आदर्श हैं। जब तक आदर्श शेष है तब तक जीवन में परिमार्जन भावी है। वैयक्तिक जीवन में किया गया अभ्यास ही उनके आचरण में प्रत्यक्ष होता है। यही अन्य के लिए आदर्श होता है। यही अभ्यास सिद्ध आचरण एवं सामान्य जनजाति की दूरी है। आदर्श जब संप्रदाय परंपरा में प्रस्तुत होता है तब उसमें अनेक संदिग्धताओं का निर्माण होता है। फलत: आदर्श के प्रति संदिग्ध होना पाया जाता है। आदर्श परंपरा नहीं है। आदर्शात्मक आचरण साधना से उद्गमित होता है न कि परंपरा से। इसका निराकरण मानवीयता पूर्ण जीवन शिक्षा, व्यवस्था एवं समाज संरचना ही है। मानवीयता पूर्ण जीवन में आचरण एवं व्यवहार संबंधी आदर्श सामान्य हो जाता है। फलत: उसकी औपचारिकता पूर्वक जो अवांछनीय तत्व निर्मित होते हैं उनका निराकरण होता है साथ ही सभी प्रकार की संदिग्धताएं दूर होती है।
“आदर्श पर्यन्त रहस्यता का अभाव नहीं है।” रहस्यता निर्भ्रमता का द्योतक नहीं है। शंका एवं प्रतिशंका रहस्य की देन है। यह मानव के लिए पीड़ा है। ईश्वर तंत्रित धर्म, स्वर्ग एवं पुनर्जन्म के संदर्भ में रहस्यमय प्रचार पुन: रहस्य का कारण होता है। यह अंततोगत्वा पीड़ा एवं समस्या ही रह जाती है। भय और प्रलोभन पर आधारित जितनी भी चर्चा है वह रहस्य ही है। यह रहस्य से ही आरंभ होता है, रहस्य का ही वर्णन करता है, साथ ही रहस्य में ही इसका अंत होता है अर्थात् विचार गति अवरूद्ध होती है। प्रलोभन से संविधा, विलासिता एवं अतिभोग में मानव आसक्त-प्रसक्त होता है जो प्रसिद्ध है। इस तथ्य से यह स्पष्ट हुआ कि प्रलोभन एवं भय पर आधारित जितने भी आख्यान, व्याख्यान, मनोरंजन, कालपेक्षात्मक कार्यक्रम है वे मानव में गुणात्मक