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उत्पादन एवं व्यवहारिकता अखण्ड समाज में, से, के लिए अपरिहार्य है।
अखण्डता के बिना सामाजिकता नहीं है। अखण्डता के लिए व्यवहारिक विशालता व साधनों की विपुलता अनिवार्य तत्व है। साधनों की विपुलता आकाँक्षाद्वय सीमा में चरितार्थ होती है। व्यवहार की विशालता सामाजिक अखण्डता में चरितार्थ होती है। सामाजिक अखण्डता के लिए व्यवसायिक उत्पादन में विपुलता को पाना तथा उसको अक्षुण्ण बनाये रखना अनिवार्य है। वस्तु उत्पादन एवं उसकी विपुलता को संयत, नियंत्रित, प्रयोजित एवं उसका सदुपयोग करने के लिए समाज में अखण्डता सहज चेतना अपरिहार्य है। इस तथ्य से यह पूर्णतया स्पष्ट होता है कि जो देश या वर्ग विपुल उत्पादन में सक्षम हुए हों एवं व्यवहार विशालता से सम्पन्न होना चाहते हों उनका संतुलित, समृद्ध समाधान एवं सर्वाभीष्ट जीवन को चरितार्थ करने में तत्पर होना ही एकमात्र उपाय है। यही युद्ध, आतंक एवं परस्पर मानव के भय से मुक्त हो पाने के लिए पर्याप्त है। “उत्पादन” तथा “संग्रह सुविधा” के योगफल में मानव का संघर्ष पूर्वक युद्ध में तत्पर होना है, जो असामाजिक सिद्ध होता है। यही सुविधा एवं अतिभोगवादी प्रवृत्ति के उद्गमन के लिए कारण एवं प्रयास की गति है अर्थात् अतिभोग प्रवृत्ति वश अधिक उत्पादन का समाजीकरण एवं संकीर्णता वश व्यक्तित्व का समाजीकरण नहीं होता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्तित्व एवं प्रतिभा का संतुलन ही सामाजिक एवं व्यवहारिक है तथा संतुलित व नियंत्रित है। यही प्रेमानुभूति योग्य क्षमता का साक्ष्य है। साक्ष्य विहीन उपलब्धि एवं उसके लिए प्रेरणा ही रहस्य है। रहस्य से मानव में तृप्ति नहीं है। रहस्यता की प्रेरणा रहस्यता के लिए नहीं, रहस्यता से मुक्ति पाने के लिए है।
“व्यक्तित्व का प्रत्यक्ष रूप सद्व्यवहार एवं आचरण ही है।” ये गुणात्मक परिवर्तन के प्रत्यक्ष लक्षण है। व्यक्तित्व एवं प्रतिभा के संतुलन एवं समृद्धि पर्यन्त अथवा पूर्णता पर्यन्त गुणात्मक परिवर्तन का अभाव नहीं है। व्यक्तित्व + उत्पादन विहीनता बराबर अंतर्विरोध बराबर क्रांति संभावना अर्थात् गुणात्मक परिवर्तन संभावना बराबर प्रतिभा संपन्नता की संभावना बराबर सामाजिकता की संभावना है। विपुल उत्पादन अर्थात् प्रतिभा संपन्नता + व्यक्तित्व विहीनता बराबर अंत:बहिर्विरोध बराबर संघर्ष बराबर प्रतिक्रान्ति बराबर युद्ध संभावना बराबर