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भ्रमित मानव समुदाय की प्रथम अवस्था भय प्रलोभन है।
आस्था व प्रलोभन युक्त समुदाय एवं उन्मुक्त व अनियंत्रित अर्थ तंत्र से प्रभावित समुदाय ही वर्ग है जो द्वितीय अवस्था है।
वर्गवाद, समुदायवादी प्रवृत्ति अन्य वर्ग एवं समुदाय पद्धति से भिन्न है या विरोधी है। परस्पर विरोध के बिना वर्गीयता या सामुदायिकता की स्थिति नहीं होती है। वर्गीय व्यवस्था में धन का सम्पतिकरण होता है। सम्पतिकरण प्रक्रिया में शोषण, दलन, दमन भावी है। फलत: लोभ एवं संग्रह प्रवृत्ति का संरक्षण, प्रोत्साहन एवं पुष्टि होती है, जिसके कारणवश शिक्षा व व्यवस्था भी व्यवसाय या वर्ग सम्मान की सीमा में सीमित हो जाती है।
यही सीमायें वर्गीय सम्मान एवं अस्तित्व की निरंतरता के लिये संघर्ष करने और उसके लिये पर्याप्त साधनों का संग्रह करने के लिए बाध्य करती हैं। यही बाध्यताएं विशालता को संकीर्णता में परिवर्तित करती हैं। ये संकीर्णताएं स्व-अस्तित्व और उसकी अक्षुण्णता के महत्व की अपेक्षा में दूसरे के अस्तित्व और उनकी अक्षुण्णता को महत्वहीन स्वीकारती हैं। ऐसी वैचारिक प्रक्रियावश ही मानव, मानव की परस्परता में आतंक एवं भय की पीड़ा है। यही वर्गीय जीवन का मूल कारण एवं परिणाम है, जबकि मानव, मानव से आतंक एवं भय की अपेक्षा नहीं करता है। यही सत्यता प्रत्येक मानव में अंतर्ध्वनित होती है कि भय का निराकरण आवश्यक है। यह मानवीयता में ही सफल है।
लोकाकाँक्षा में निर्विषमता की मंगलमय कामना पाई जाती है। जन्म से ही विश्वास का प्रकटन मानव में रहता है, जो माता-पिता के साथ प्रत्यक्ष होता है। निर्विषमता की अपेक्षा मानव में शैशव काल से ही दृष्टव्य है। वर्ग वाद को संबोधित, स्थापित, प्रोत्साहित एवं संरक्षण करने से ही वही शिशु जो जन्म से निर्विषमता की अपेक्षा में प्रवृत्त होता है जाति, मत, सम्प्रदायात्मक सीमा वश वर्ग संघर्ष के लिये तत्पर हो जाता है। यही वर्ग परंपरा का परिणाम है।
वर्गीयता भय, सशंकता एवं अविश्वास से मुक्त नहीं है। यही संग्रह एवं प्रलोभन का प्रथम कारण है। संग्रह आदि पाँच प्रवृत्तियाँ अमानवीयता की सीमा में क्रियाशील हैं न कि मानवीयता की