41.
समाज संरचना का आधार “मूल्य त्रय” ही है।
“मूल्य त्रय” की एकसूत्रता अखण्ड सामाजिकता के लिए अनिवार्य है। व्यवहार एवं उत्पादन के मध्य में रिक्तता नहीं है। इन दोनों की संयुक्त स्थिति मानव जीवन में दृष्टव्य है। व्यवहार, उत्पादन के लिए प्रेरणा है। व्यवसाय उत्पादन के लिए साधन है। व्यवहार एवं उत्पादन में आश्वस्त एवं विश्वस्त होना तथा उसकी अक्षुण्णता या परंपरा का सुदृढ़ होना ही समाज एवं सामाजिकता की उपलब्धि है। व्यवहार एवं उत्पादन की सफलता क्रम से अनुभूति एवं समाधान का प्रकटन है। मानव में प्रत्येक असफलता को सफलता में परिणत करने की कामना पायी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति में, से, के लिए सामाजिक संरचना में भागीदारी करने का अवसर समान है। उसके योग्य क्षमता में वैविध्यता ही शिक्षा एवं व्यवस्था से परिमार्जित एवं नियंत्रित होने के लिए प्रस्तुत होता है। समाज संरचना का प्रत्यक्ष रूप व्यवहार एवं उत्पादन ही है। उत्पादन विनिमय अभीप्सा, व्यवहारिक अभीष्ट मानव मात्र में समान है। अवसर एवं साधन की विषमता ही उनमें वैविध्यता है। उनमें जो वैविध्यता है, वही प्रकटन में वैविध्यता है। यही परस्परता में वैविध्यता है। मानव में मूलत: अभीप्सा एवं अभीष्ट साम्य होने के कारण समाज संरचना के आधार में स्थिरता पायी जाती है। यही सत्यता आशा, आकाँक्षा एवं संकल्प को उद्गमित कराती है, जिससे समुचित एवं संतुलित समाज संरचना सिद्ध हो सके। यही चिंतन परंपरा का आधार एवं स्रोत है। संतुलित समाज संरचना का प्रत्यक्ष रूप व्यवहार एवं उत्पादन की अविभाज्यता है। उत्पादन शिक्षा एवं उसका संरक्षण जितना महत्वपूर्ण है उससे अत्यधिक व्यवहार शिक्षा एवं उसका संरक्षण महत्वपूर्ण है। “व्यवहार, उत्पादन के लिए प्रेरणा है। उत्पादन, व्यवहार के लिए साधन हैं।” यही वास्तविकता है। व्यवहार शिक्षा में अपूर्णता ही उत्पादन-विनिमय उपलब्धियों की अपव्ययता है। मानव का अपव्ययता पूर्वक सामाजिक सिद्ध होना संभव नहीं है। इन वास्तविकताओं के अतिरिक्त वस्तु मूल्य से शिष्ट मूल्य एवं शिष्ट मूल्य से स्थापित मूल्य वरीय है ही। स्थापित मूल्य में शिष्ट मूल्य व वस्तु मूल्य समर्पित होता है न कि वस्तु व शिष्ट मूल्य में स्थापित मूल्य। इसका कारण केवल “गुरू मूल्य में लघु मूल्य का समाना ही है।” व्यवहार शिक्षा की प्रधान उपलब्धि स्थापित मूल्य में शिष्ट मूल्य का एवं शिष्ट मूल्य में वस्तु मूल्य का नियोजन होना ही है। ऐसी