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जनाकाँक्षा को सफल बनाने योग्य शिक्षा व व्यवस्था
“जन्म से प्रत्येक व्यक्ति न्याय का याचक है, साथ ही न्याय प्रदान करने में असमर्थ है।” वह सही कार्य व्यवहार करना चाहता है, भ्रमवश गलती और अपराध करता है। साथ ही वह भौतिक समृद्धि एवं बौद्धिक समाधान चाहता है, उसमें स्वयं को असमर्थ पाता है। (समस्या और दरिद्रता से पीड़ित रहता है। इसी तथ्यवश मनुष्य शिक्षा व व्यवस्था में समर्पित होता है। जब उसे शिक्षा व व्यवस्था से संतोष नहीं मिलता तब संताप, आक्रोश, निराशा एवं असफलता से पीड़ित होता है, फलत: आवेश एवं आक्रोश से युक्त होकर वह विद्रोह करता है। वह असफलता प्राप्त करता है। वह असफलता व संताप को पाकर विद्रोह व आतंकवश छल, कपट व पाखंड करता है, जिसके लिए पूर्व निर्मित द्रोह ही आमूल कारण है। मानव असफलता, निराशा व कुंठा को पाकर आत्महत्या में प्रवृत्त होता है, जबकि यह मानव की वांछित घटना नहीं है। अस्तु जनाकाँक्षानुरूप शिक्षा एवं व्यवस्था की अपरिपूर्णता ही ऊपरवर्णित अवांछनीय घटनाओं तथा परिस्थितियों के कारण है, जो स्पष्ट है।)
जनाकाँक्षा को सफल बनाने योग्य शिक्षा व व्यवस्था की अपेक्षा प्रत्येक व्यक्ति में किसी न किसी अंश में पायी जाती है अथवा शिक्षा व व्यवस्था द्वारा जनजाति को आश्वस्त व विश्वस्त करने का प्रयास किया जाता रहा है।
शिक्षा व व्यवस्था प्रदान करने वाले सदा ही प्रबुद्ध घोषित किए गए हैं अथवा जनजाति को विवश होकर उन्हें प्रबुद्ध समझना पड़ा है।
“राज्यनैतिक एवं धर्म नैतिक नेतृत्व प्रसिद्ध है।” दोनों प्रकार के नेतृत्व के मूल में मंगल कामना है ही जिसमें अर्थ के सदुपयोग एवं सुरक्षा की अवधारणा पाई जाती है। जब तक कार्यक्रम वर्ग सीमावर्ती है तब तक सर्वमंगल कार्यक्रम संभव नहीं है।
नेतृत्व पराभव का कारण अक्षमता एवं वर्ग समुदाय प्रवृत्ति है जो स्पष्ट है।
नेतृत्व तथा नेतृत्व की अपेक्षा का अभाव नहीं है, नेतृत्व में व्यवस्था व शिक्षा का आश्वासन समाया हुआ है, इसलिए नेतृत्व एक अवश्यंभावी घटना है। मानव के प्रत्येक स्तर, अवस्था एवं