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प्रत्येक स्थिति में किए गए अभ्यास का प्रत्यक्ष रूप ही व्यवहार एवं व्यवस्था है।
अभ्यास लक्ष्य की अपेक्षा में ही सम्पन्न होता है। मानव जीवन का लक्ष्य सुख, शान्ति, संतोष एवं आनन्द ही है। संपूर्ण वस्तु मूल्य भी इसी में प्रायोजित होते हैं। सुख, शांति, संतोष एवं आनंद मूल्य त्रयानुभूति के प्रमाण हैं। अनुभूति सत्तामयता एवं स्थापित मूल्यमयता में होती है। यही आप्लावन, आह्लाद, उत्साह एवं प्रसन्नता है। स्थापित मूल्यानुभूति ही अंततोगत्वा प्रेममयता की अनुभूति है। अस्तु, अनुभवमयता ही प्रेममयता, प्रेममयता ही जागृति पूर्ण जीवनमयता, जागृति पूर्ण जीवनमयता ही अभ्युदयमयता, अभ्युदयमयता ही सत्यमयता में अनुभवमयता है। यही अभ्यास की चरमोपलब्धि है। संवेदनशीलता का विस्तार अर्थात् गुणात्मक परिवर्तन अनुभव योग्य क्षमता पर्यन्त होता है। ऐसी क्षमता का विकास जीवावस्था से आरम्भ होता है और दिव्य मानवीयता की अवस्था में परिपूर्ण होता है। पूर्णता के प्रति जो पीड़ा है, वही संवेदना है। यही संवेदना सामाजिकता के लिए उत्प्रेरित करती है। यह उत्प्रेरणा बाध्यता में, बाध्यताएं इच्छा में, इच्छाएं तीव्र इच्छा में, तीव्र इच्छाएं संवेग में, संवेग व्यवहार एवं प्रयोग में अभिव्यक्त होते हैं। फलत: यही मानवीयता में स्थापित मूल्यों की अर्हता है। यही अर्हता क्रम से सामाजिकता का निर्वाह में स्पष्ट है और सामाजिक मूल्यों का अनुभव करती है। स्थापित मूल्यों में प्रेम ही श्रेष्ठ मूल्य है। सभी स्थापित मूल्य प्रेम से संबद्ध हैं ही। प्रेम ही विशालतम प्रभावशाली मूल्य है। वह शिष्ट मूल्य पूर्वक श्रद्धा, स्नेह एवं वात्सल्य के माध्यम से अनुभवगय होता है जिससे ही सामाजिकता का निर्वाह, शिष्ट मूल्य की अभिव्यक्ति एवं वस्तु मूल्य का सदुपयोग होता है। यही अर्थ का सदुपयोग होने का यथार्थ रूप है। अर्थ का सदुपयोग होना सर्ववांछित तथ्य है। यह स्थापित मूल्यानुभूति पूर्वक ही संपन्न होता है। प्रेमानुभूति ही स्वतंत्रता को स्पष्ट करती है। प्रेमानुभूति के बिना स्वतंत्रता पूर्वक मानवीयता का निर्वाह करना संभव नहीं है। स्वतंत्रता जीवन का लक्ष्य है। “मानवीयता से परिपूर्ण होना ही स्वतंत्रता की प्रतीति, प्रेमानुभूति का भास एवं उसकी संभावना का आभास होता है।” ये ही अपनी स्पष्टता पूर्वक अनुभव में प्रमाणित होते हैं। “प्रेमानुभूति का प्रधान लक्षण अनन्यता है।” प्रत्येक मानव अपने से विकसित के साथ अनन्यता