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मानव संस्कृति
मानवीयतापूर्ण आचरण एवं व्यवहार को स्मरण में लाने, प्रेरणा प्रदान करने एवं मार्गदर्शन कराने योग्य क्षमता ही मानव संस्कृति है, जिसमें जन्म से मृत्यु तक की वैध घटनाओं के निर्वाह पक्ष का समाया रहना आवश्यक है, जो पीढ़ी से पीढ़ी को प्रदत्त हुआ करती है।
संस्कृति को आचरण में लाना ही सभ्यता है। दायित्व व कर्त्तव्य निर्वाह ही उसका प्रत्यक्ष रूप है।
मानव संस्कृति एवं सभ्यता ही सामाजिकता को सिद्ध करती है। यही मानव की उपलब्धि, लक्ष्य एवं कार्यक्रम है।
संस्कृति व सभ्यता का योगफल ही सामाजिकता है, जिसे वहन करना ही समाज है। यही विधि व व्यवस्था का प्राण और त्राण है।
संस्कृति ही विधि एवं सभ्यता ही नीति है। विधि व नीति की संयुक्त प्रक्रिया ही व्यवस्था है।
व्यवस्था की चरितार्थता संस्कृति व सभ्यता के रूप में प्रत्यक्ष है। इसलिए नियंत्रण विहीन इकाई नहीं है। यही समाधान न्याय एवं संयम है। संयम ही सामाजिक आचरण है। मानव में, से, के लिए कायिक, वाचिक, मानसिक संयम (नियंत्रण) प्रसिद्ध है।
जागृति अनुरूप नियंत्रण का अभाव ही असंतुलन है। यही असंयमता है जो जागृति की ओर गत्यावरोध एवं पतन (ह्रास)का कारण भी है। यह प्रकृति के “चक्रत्रय ” में दृष्टव्य है। प्रत्येक मानव में संयमता बौद्धिक, सामाजिक एवं प्राकृतिक क्षेत्र में अनुभव, समाधान, व्यवहार, आचरण एवं उत्पादन के रूप में प्रत्यक्ष है।
अनुभव प्रतिष्ठा एवं समाधान क्षमता में, से, के लिए मानव ने अनवरत प्रयास किया है। प्रत्येक प्रयास में जागृति अभिलाषा समायी हुई है।
जागृति अभिलाषानुरूप प्रयास से गुणात्मक परिवर्तन, निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य पूर्वक सफल हैं।