4.
अखण्ड समाज गति सहज सामाजिकता की अनिवार्यता
1. भ्रम व भय से मुक्ति पाने के लिए
2. बौद्धिक समाधान के लिए
3. भौतिक समृद्धि के लिए
अभयता ही सुरक्षा व सतर्कता, समाधान ही सदुपयोग व सजगता, समृद्धि ही अर्थ है। मानव ही उत्पादन में अर्थ एवं सुरक्षा का, व्यवहारायाम में न्याय एवं सहअस्तित्व का, विचारायाम में समाधान व दर्शन क्षमता का, अनुभवायाम में परमानन्द एवं सहअस्तित्व का उद्गाता है।
मानव में विचार एवं दर्शन क्षमता का प्रमाण न होना ही भ्रम है। दर्शन क्षमतावश सुख की अपेक्षा में दश सोपानीय व्यवस्था कार्य, त्रिधाकार्य क्षेत्र (भौतिक, बौद्धिक, अध्यात्मिक) के योग से “नीति त्रय” के आधार पर “वादत्रय” का विश्लेषण पूर्वक “तात्रय” की व्याख्या सहित मानवीयता में मानव की पाँचों स्थितियों में आचरण संहिता को स्पष्ट करता है, जिसका प्रत्यक्ष रूप अखण्ड सामाजिकता है। फलत: न्याय का अनुभव है, जो सुख है, यही लोकव्यापीकरण पूर्वक अभय है, जिसकी चिराकाँक्षा मानव में है।
अकेले मानव में, से, के लिए सार्थकता सिद्ध नहीं होती क्योंकि समाज या सामाजिकता इसका मूल आधार या कारण है। कारण, गुण, गणित ही निर्णायक तथ्य है, जो “प्रमाण त्रय” (व्यवहार, प्रयोग, अनुभव प्रमाण) को सिद्ध करता है।
समाज का आधार
1. मानव एवं मानवीयता
2. प्रमाण त्रय
3. स्थापित संबंधों में निहित स्थापित मूल्य
4. नीतित्रय