27.
सामाजिकता का आधार संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था ही है।
उपलब्धि सहअस्तित्व एवं समृद्धि है। पूर्णता को प्रमाणित करने की प्रक्रिया श्रृंखला ही संस्कृति है, जिसका आचरण ही सभ्यता है। मानव जीवन में पूर्णता का प्रमाण केवल सहअस्तित्व ही है, जिसकी व्यवहारिक सुगमता के लिए समृद्धि की आवश्यकता होती है जो महत्वाकाँक्षा एवं सामान्य आकाँक्षा के अंतर्गत सीमित हैं। संस्कृति के मूल रूप विचार ही है। ये विचार “तात्रय” मानवीयता, देवमानवीयता व दिव्य मानवीयता के अर्थ में है। अमानवीय परंपरा सामाजिक नहीं है। असामाजिक आहार, विहार, व्यवहार, जाति, धर्म, भाषा, उत्पादन, उपभोग, वितरण ये सब सहअस्तित्व को सिद्ध करने में समर्थ सिद्ध नहीं हुए हैं। सहअस्तित्व के बिना अखण्ड समाज एवं सामाजिकता नहीं है। उत्पादन परंपरा भी सामाजिकता के लिए है। सामाजिकता का विरोध, विद्रोह एवं आतंक में प्रयुक्त उत्पादन सहअस्तित्व के लिये निषेध है। इसी आंकलन वश इस सीमा में प्रयुक्त सभी शक्तियाँ अनुपयोगी, दुरूपयोगी और निरर्थक सिद्ध हुई साथ ही समाज एवं सामाजिकता के विकास अर्थात् पूर्णता के क्रम में बाधक सिद्ध हुई है। सामाजिकता के बिना मानव परंपरा में सफल अर्थ व्यवस्था नहीं है। सहअस्तित्व में ही सफलता एवं उसकी निरंतरता है। वर्ग समुदाय में की गई अर्थ व्यवस्था सर्वप्रथम दूसरे वर्ग का दलन, दमन, उन्मूलन करने के लिये बाध्य हो जाती है। यही शोध-प्रतिशोध का कारण एवं सहअस्तित्व की मूल बाधा है। इसका निराकरण मानवीयता पूर्ण अर्थ व्यवस्था ही है।
“संस्कृति का शुद्ध रूप संस्कार सम्पन्न होने की परंपरा है।” यही पूर्ण शिक्षा है। मानव में संस्कार गुणात्मक परिर्वतन क्रिया परंपरा है। गुणात्मक परिर्वतन जागृति अनुक्रमानुगमन या अनुसरण है। मानव की जागृति अमानवीयता से मानवीयता में, मानवीयता से अतिमानवीयता में स्पष्ट है। क्रम ही परंपरा है। व्यतिक्रम परंपरा नहीं है। व्यतिक्रम का सुधार होना भावी है। व्यतिक्रम सहअस्तित्व को प्रदान करने या सिद्ध करने में समर्थ नहीं है। इसी कारणवश प्रत्येक व्यतिक्रम के स्थान पर क्रमानुषंगीयता को पाने के लिये मानव प्रयासरत है। व्यतिक्रमता ही अमानवीयता है, जो अपराध एवं गलती है। मानवीयता पूर्ण परंपरा में ही प्रणाली, पद्धति एवं नीति पूर्ण प्रक्रिया सिद्ध होती है क्योंकि मानव मानवीयता को स्वीकार करने के लिये प्रवर्तनशील है। मानवीयता