54.
योगाभ्यास जागृति के अर्थ में चरितार्थ होता है।
यह मानवीयतापूर्ण जीवन के साथ आरंभ होता है जो श्रवण, मनन एवं निदिध्यास पूर्वक अथवा धारणा, ध्यान एवं समाधि पूर्वक चरितार्थ होता है। जीवन चरितार्थता ही आचरणपूर्णता है। योगाभ्यास शास्त्राध्ययन, उपदेश एवं स्वप्रेरणा का योगफल है। इन सब में प्रमाणिकता का होना अनिवार्य है। मानवीयता पूर्ण जीवन के साथ वांछित वस्तु देश एवं तत्व में चित्त-वृत्तियों का संयत होना पाया जाता है। यही धारणा है। धारणा पर पूर्णाधिकार के अनंतर उसके सारभूत भाग में अथवा वांछित भाग में चित्त-वृत्ति का केन्द्रीभूत होना पाया जाता है जो ध्यान का द्योतक है। ध्येय के अर्थ मात्र में अर्थात् ध्येय के मूल्य में चित्त-वृत्ति एवं संकल्प का निमग्न होना ही समाधि है। यही सत्तामयता में अनुभूति है। यही योगाभ्यास की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है। इसी क्रम के अर्थ में श्रवण, मनन एवं निदिध्यास चरितार्थ होता है। श्रवण का तात्पर्य धारणा से है। मनन का तात्पर्य निष्ठा एवं ध्यान से है। निदिध्यास का तात्पर्य सहज निष्ठा एवं सहज समाधि है। सहज समाधि का तात्पर्य सत्ता में अनुभूतिमयता की निरंतरता या अक्षुण्णता है। अक्षुण्णता प्रत्येक क्रियाकलाप एवं कार्यक्रम में भी स्थिर रहने के अर्थ में है। यही भ्रम मुक्ति है। योगाभ्यास पूर्णतया सामाजिक एवं व्यवहारिक है। अव्यवहारिकता एवं असामाजिकता पूर्वक योगाभ्यास होना संभव नहीं है। मानवीयता के अनंतर ही अभ्युदय का उदय होता है। पूर्णता पर्यन्त इस उदय का अभाव नहीं हैं। उदय एवं अभ्यास का योगफल ही गुणात्मक परिवर्तन है जो योगाभ्यास पूर्वक चरितार्थ होता है।
व्यायाम, आसन व प्राणायाम योगाभ्यास के लिए सहायक हैं। शरीर का स्वेच्छानुरूप उपयोग करने, स्वस्थ रखने के लिए ये प्रक्रियाएं आवश्यक हैं। वातावरण अभ्यास के लिए सहज उपलब्धि है। कृत्रिम वातावरण ही अति प्रभावशाली है जिसका निर्माण मानव ही करता है। कृत्रिम वातावरण मानवीयता पूर्ण या अमानवीयता भेद से दृष्टव्य है। कृत्रिम वातावरण के लिए शिक्षा एवं व्यवस्था प्रधान तत्व हैं। प्रकाशन, प्रदर्शन व प्रचार भी उसी के अनुरूप संपन्न होता है। विपरीत वातावरण अर्थात् अमानवीय वातावरण में योगाभ्यास होने के लिए स्वयं मानवीयता से परिपूर्ण होना अनिवार्य हो जाता है। ऐसी स्थिति में यह साधनों में गण्य है। योगाभ्यास का पूर्व साधन या मूल साधन मानवीयता ही है। मानवीयता पूर्ण जीवन में वैचारिक समत्व स्वभावत: