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मानव का संपूर्ण कार्यक्रम धार्मिक, आर्थिक एवं राज्यनीति में, से, के लिए है।
यही उत्पादन, व्यवहार, विचार एवं अनुभूति पूर्णता को प्रदान करने में चरितार्थ होता है। इन पूर्णता प्रदायी क्षमता में असमर्थ “नीति त्रय” स्वयं में परिपूर्ण नहीं है। अर्थात् जीवन चरितार्थता योग्य कार्यक्रम प्रदायी उपकार सिद्ध नहीं होती। नीति एवं व्यवस्था का मूल उद्देश्य पूर्णता से संपन्न होना और पूर्णता को प्रस्थापित, स्थापित एवं संरक्षित करना ही है। तृप्ति ही पूर्णता का द्योतक है। आयाम चतुष्टय में ही तृप्ति की चरितार्थता है। यह समृद्धि, अभय, समाधान एवं सत्य है। इनसे संपन्न होना ही जीवन तृप्ति विकास, सतर्कता, सजगता एवं भ्रम मुक्ति सिद्धि होती है। कार्यक्रम तृप्ति की अपेक्षा के अर्थ में है। उन्हें पाने के लिए ही सर्व प्रयास है। व्यवस्था, विधि, सभ्यता, संस्कृति प्रत्यक्ष रूप में प्रयास है। इसकी सफलता शिक्षा प्रणाली एवं व्यवस्था संहिता पर निर्भर है जो मानव की ही प्रबुद्धतापूर्ण क्षमता के अनुरूप-प्रतिरूप होती है। पुन: यही शिक्षा व्यवस्था पूर्वक प्रबुद्ध जनजाति का निर्माण करने का आधार होती है। इस प्रकार प्रबुद्ध व्यक्ति के द्वारा शिक्षा एवं व्यवस्था संहिता का उद्गमन होना, उसके व्यवहारान्वयन से प्रबुद्ध जनजाति का निर्माण होना उदितोदित क्रम से अर्थात् पुन: परिष्करण, परिमार्जन तथा अनुसंधान पूर्वक संपन्न होना पाया गया है। इस क्रम में गुणात्मक परिवर्तन ही अभीष्ट रहा है। मौलिक अधिकार का प्रयोग एवं व्यवहार सुलभ होना ही “नीति त्रय” की उदात्तता है। “नीति त्रय” संहिता के उद्गमन का मूल उद्देश्य है। इसकी सार्थकता व्यवहार में ही सिद्ध होता है। यही अखण्डता है। प्रत्येक स्तर में मौलिक अधिकार का व्यवहारान्वयन होना ही स्वतंत्रता है। यही अभयता है। जीवन मौलिकता से भिन्न नहीं है। यही सत्यता मानव को जीवन संचेतनानुक्रमानुंषगी व्यवहार करने के लिए बाध्यता है। यही “कार्यक्रम त्रय” के उद्गमन का मूल कारण है। जीवन कार्यक्रम विहीन नहीं है। काँक्षा सहित नियति क्रमानुषंगी प्रक्रिया ही कार्यक्रम है। क्रम केवल नियति सहज है। नियति स्वयं में विकास एवं जागृति परंपरा है। नियंत्रित गति ही नियति है। विकास के क्रम में पायी जाने वाली क्रम प्रणाली अथवा सघन प्रणाली ही नियति क्रम है। क्रम विकास व जागृति के अतिरिक्त प्रमाणित नहीं है। प्रामाणिकता ही विकास व जागृति की गरिमा है। यह मानव के