15.
लाभ उत्पादन नहीं है।
कम प्रदाय के बदले में अधिक वस्तु व सेवा को पाना लाभ है यही शोषण का प्रत्यक्ष रूप है। जबकि श्रम नियोजन का परिणाम ही उत्पादन है जिसमें उपयोगिता एवं सुन्दरता मूल्य सिद्ध होता है। श्रम नियोजन से ही समृद्धि होती है न कि लाभ से क्योंकि मुद्रा शोषण पर आधारित वाणिज्य की सीमा में लाभ-हानि की संभावनाएं होती है। यह दोनों स्थिति उत्पादन या उत्पादन के लिये सहायक नहीं है। वाणिज्य कर्म शुद्धत: विनिमय के अर्थ में उत्पादन या उत्पादन के लिये सहायक सिद्ध होता है न कि लाभ के अर्थ में। उत्पादन प्रयास आवश्कता पर आधारित होती है, जबकि लाभाकाँक्षित वाणिज्य कर्म मांग पर आधारित होता है। लाभाकाँक्षी वाणिज्य पद्धति में कृत्रिम अभाव की स्थिति का निर्माण किया जाता है। अभाव की कृत्रिमता के लिये वाणिज्य साधनों व वस्तुओं का शेखरीकरण (संग्रह पूर्वक वस्तुओं को अदृश्य करना)कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया का मूल उद्देश्य उपभोक्ताओं में वस्तु सुलभता के संदर्भ में संदिग्धता बनाये रखना होता है, जिससे अधिक लाभ अर्जित किया जा सके। वस्तुओं की अदृश्यीकरण प्रक्रिया पूंजीवादी व्यवस्था पर आधारित होती है जो स्पष्ट है। इसका निराकरण केवल श्रम नियोजन एवं श्रम विनिमय पद्धति का अनुसरण है। “लाभ संग्रह होता है न कि उत्पादन।” लाभ निर्मित पूंजी ही वस्तु विनिमय में असंतुलन का प्रधान कारण है। पूंजी अधिक लाभ से निर्मित होती है जो प्रत्यक्षत: शोषण है और यही अधिक लाभ के लिये नियोजित होती है। वस्तुओं की कृत्रिम अदृश्यता केवल पूंजीवादी व्यवस्था में ही होती है। पूंजीवादी वाणिज्य भी वर्गीयता का सहायक है न कि समाज का व सामाजिकता का। सामाजिक वाणिज्य प्रक्रिया के लिए विनिमय पद्धति ही शरण्य है। साम्यवादी विधि से भी अतिरिक्त मूल्य सिद्धांतवश लाभ मुक्ति की कामना को सर्वाधिक प्रकट करता हुआ साम्यवादी देशगत व्यक्तियों का शोषण न होने के लिए बहुत कुछ सूझबूझ प्रस्तुत करते हुए देशगत लाभ या राष्ट्रगत लाभ के लिये प्रतिबद्ध निष्ठान्वित होना ही पड़ा। इसी के साथ सामान्य जनता क्षमता के अनुसार कार्य करें व आवश्यकतानुसार भोग करें। इस आश्वासन के आधार पर व्यवस्था संभव नहीं हुई, इसलिए साम्यवादी व्यवस्था पराभावित हुआ।