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कुशलता, निपुणता एवं पाण्डित्य ही ज्ञानावस्था की मूल पूंजी है।
निपुणता व कुशलता का प्राकृतिक ऐश्वर्य पर नियोजन बराबर उपयोगिता एवं कला मूल्य की स्थापना है। कुशलता एवं पाण्डित्य का व्यवहार में नियोजन बराबर शिष्ट मूल्य का प्रकटन एवं निर्वाह है। पाण्डित्य का अनुभव मूलक विधि से नियोजन बराबर मानव मूल्य व स्थापित मूल्यों का निर्वाह है। पाण्डित्य से परिपूर्ण होने से ही धीरता, वीरता एवं उदारता पूर्ण स्वभाव व्यवहृत होता है। निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य से परिपूर्ण होने का अवसर प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान है। जागृत व्यक्ति अजागृत व्यक्ति को कुशलता, निपुणता, पाण्डित्य प्राप्त कराने के लिए दायी है। उसे उससे वंचित रखना सामाजिक द्रोह है अर्थात् अजागृत के विकास में अवरोध है। विकास में अवरोध ही आतंक, भय एवं सशंकता है। यही मानव में अंततोगत्वा प्रताड़ना है। इस प्रताड़ना से परित्रस्त मानव का विकास अर्थात् समाधान एवं समृद्धि के लिए आतुर-कातुर एवं आकुल-व्याकुल होना स्वाभाविक है। आवेश ही षड्विकार के रूप में बहिर्गत होता है जो काम, क्रोध, लोभ मोह, मद एवं मात्सर्य है। ये आवेश मानव के संतुलित रहने में बाधक हैं इनमें से किसी एक से मानव के संबद्ध होने मात्र से ही क्रम से एक के साथ एक आवेश उदयमान होते हैं, जिनको प्रत्यक्ष में रूप में देखा जाता है। पाण्डित्य संज्ञानीयता पूर्ण संचेतना का अध्ययन है। संचेतनशीलता का तात्पर्य ही पूर्णता को पाने की उत्कंठा है। पूर्णता सतर्कता एवं सजगता के रूप में प्रत्यक्ष होती है। पूर्णता के बिना मानव आश्वस्त व विश्वस्त नहीं है। संचेतना ही दर्शन क्षमता है। दर्शन क्षमता ही वातावरण क्रिया संकेत ग्रहण एवं प्रसारण प्रक्रिया है। यही मानव को स्वयं की विवेचना के लिए बाध्य करती है। वातावरणस्थ इकाईयों के विश्लेषण की श्रृखंला में स्वयं के विश्लेषण के लिए बाध्यता होती है, जिसे प्रत्येक स्तर में प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है। मानव जीवन का अतिमहत्वपूर्ण पक्ष संज्ञानशीलता से नियंत्रित संवेदनशीलता ही है। संचेतनावश ही दूरादूर, कालाकाल, उचितानुचित, विहिताविहित, नित्यानित्य, सत्यासत्य, न्यायान्याय, धर्माधर्म की दर्शन एवं अनुभव क्षमता है। संचेतना का सर्वोच्च प्रयोजन अनुभव क्षमता है। अनुभव क्षमता ही जागृति है। अनुभव से अधिक आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता से अधिक के लिए प्रयास नहीं है, यही अक्षुण्ण परंपरा है, जो प्रसिद्ध है। संवेदनशीलता व