18.
प्रत्येक मानव इकाई भ्रम, भय, रहस्य मुक्ति के लिए प्रयासरत है।
संदिग्धता सशंकता एवं विरोध ही भय है। समाधान के विपरीत में विरोध है। मानव जीवन के कार्यक्रम को मानवीयता में स्पष्ट करने की क्षमता का अभाव ही संदिग्धता, रहस्यता, सशंकता एवं भय है।
मूलत: शुभाकाँक्षा रहते हुए भी कार्यक्रम में जो अपूर्णता रह जाती है वह आकाँक्षा के विपरीत फल का कारण बनती है यही अविश्वास स्थली है। अविश्वास पूर्वक सामाजिकता का निर्वाह नहीं है। यही भ्रम है।
भ्रमित विधि से संस्था की प्रथम व द्वितीय अवस्था में भय से मुक्ति पाना संभव नहीं है। इसी विवशतावश परिवार एवं वर्ग सीमावर्ती व्यवस्था संदिग्धता से मुक्त नहीं है। इसी संदिग्धतावश ही समर शक्ति का विस्तार हुआ है। समर संभावना पर्यन्त समाज एवं सामाजिकता की उपलब्धि नहीं है। समाज एवं सामाजिकता के बिना मानव आश्वस्त एवं विश्वस्त नहीं है। प्रत्येक मानव आश्वस्त होने के लिए उत्पादन, विश्वस्त होने के लिए व्यवहार करता है। जब उसे उपलब्ध नहीं कर पाते हैं तब उनमें निराशा एवं कुण्ठा उत्पन्न होती है। ये सब प्रक्रियायें भ्रांति पद चक्र में पाई जाती है। प्रत्येक मानव भ्रांति से मुक्ति पाना चाहता है। यह केवल मानवीयता में सफल एवं अमानवीयता में असफल होता है।
सफलता के लिये ही मानव ने अशेष प्रयास किये हैं। सफलता चारों आयामों एवं दश सोपानीय व्यवस्था की एकसूत्रता है। यह सहअस्तित्व समाधान एवं समृद्धि को प्रत्यक्ष करती है। यही सर्वमंगल जीवन है जिसके लिये मानव चिर प्रतिक्षारत रहा है और जिसकी संभावना भी सर्वकाल में है। अमानवीय जीवन में ही अपराध की संभावनायें चारों अवस्थाओं एवं पाँचों स्थितियों में है। बाल्य-कौमार्य, कौमार्य-युवा, युवा-प्रौढ़, प्रौढ़-वृद्धावस्थायें दृष्टव्य है। इन्हीं अवस्थाओं में विभिन्न कारणवश अपराध प्रवृत्तियों की क्रियाशीलता मानव में पाई जाती है। प्रधानत: शिशु-कौमार्य अवस्था में अपराध की संभावना माता-पिता के संरक्षण के बिना नहीं होती है। कौमार्य युवावस्था में अज्ञान, कौतूहलवश माता-पिता और साथियों के प्रोत्साहन अपराध किए जाते हैं। युवा-प्रौढ़ावस्था में मानव अज्ञान, कौतूहल, प्रलोभन, अत्याशा, कामुकता एवं अभाववश