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मानव में संचेतनशीलता ही संस्कार एवं जागृति सम्पन्नता सहज आधार एवं प्रमाण है।
यही व्यक्तित्व एवं प्रतिभा को प्रकट करती है। सतर्कता सहित सजगता ही प्रतिभा और सजगता ही व्यक्तित्व का प्रधान परिचय है, जिसके लिए निपुणता कुशलता एवं पाण्डित्य है। यही प्रतिभा के रूप में प्रमाण सिद्ध होता है। “तात्रय” (मानवीयता, देव मानवीयता, दिव्य मानवीयता) में किए जाने वाले आहार, विहार एवं व्यवहार के रूप में व्यक्तित्व प्रमाणित होता है। प्रतिभा में से निपुणता, कुशलता का परिचय उत्पादन में, व्यक्तित्व का परिचय व्यवहार में स्पष्ट होता है। तन, मन, धनात्मक अर्थ के सदुपयोग की सजगता उसके संरक्षण में सतर्कता है।
सतर्कता व सजगता प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का संयुक्त रूप ही मानव जीवन है। यही प्रत्येक व्यक्ति में क्षमता, योग्यता और पात्रता के रूप में दृष्टव्य है जो वहन, प्रकटन एवं ग्रहण क्रिया है। प्रतिभा के नियोजन में उपयोगिता एवं कला सिद्ध होती है। यही सतर्कता है। यही नियोजन में उपयोगिता एवं कला सिद्ध होती है। यही सतर्कता है। यही व्यवहार विषमता का उन्मूलन करती है। फलत: अभयता सिद्ध होती है। अनुभव मूलक आचरण में ही सजगता सिद्ध होती है, जो अर्थ के सदुपयोग के रूप में स्पष्ट होती है। यही सहअस्तित्व को सिद्ध करती है।
“जागृत संचेतना ही प्रतिभा, प्रतिभा ही सतर्कता एवं सजगता, सतर्कता एवं सजगता ही जीवन, जीवन ही जागृति, जागृति ही व्यक्तित्व, व्यक्तित्व ही आचरण, आचरण ही संचेतना है।” जागृत जीवन और शरीर के तन्त्र में स्पन्दन ही कम्पनात्मक गति, कम्पनात्मक गति ही संचेतना, संचेतना ही कम्पनात्मक गति है। यही चैतन्य क्रिया की महिमा, गरिमा एवं विशेषता है। मानव जीवन में अभिव्यक्त होने वाले संपूर्ण आचरण “तात्रय” में दृष्टव्य है। प्रतिभा ही उत्पादन-विनिमय एवं व्यवहार में प्रकट होती है। यही उत्पादन की सीमा में उपयोगिता एवं कला मूल्य का मूल्याँकन एवं प्रस्थापन तथा व्यवहार में स्थापित मूल्य एवं शिष्ट मूल्य का निर्वाह है। यही विचार में समाधान, अस्तित्व में अनुभूति है।
“दर्शन क्षमता ही प्रतिभा, प्रतिभा ही उत्पादन-विनिमय एवं व्यवहार के लिए प्रवृत्ति है।” आचरण ही मानव की अभिव्यक्ति है। अभिव्यक्ति ही प्रकटन, प्रकटन ही जागृति पूर्वक