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केवल साधनों की प्रचुरता मानवीयता को स्थापित करने में समर्थ नहीं है।
समझदारी से समाधान एवं श्रम से समृद्धि है। क्योंकि :-
- साधन ही सामाजिकता का एकमात्र आधार नहीं है।
- संपूर्ण साधन मानव की स्वेच्छा से, स्वेच्छानुरूप ही निर्मित होते हैं।
- संपूर्ण साधन मानव की स्वेच्छा से नियोजित और प्रायोजित होते हैं।
- साधन मनुष्यों को निर्मित नहीं करता है।
- उत्पादन मानव का एक आयाम मात्र है न कि मानव जीवन समग्र।
समाधानात्मक भौतिकवाद, व्यवहारात्मक जनवाद, अनुभवात्मक अध्यात्मवाद का संयुक्त रूप ही सहअस्तित्व एवं सहअस्तित्ववाद है। यही प्रत्येक स्थिति एवं प्रत्येक आचरण को अतिसंतृप्ति प्रदान करने के लिए सूत्र व्याख्या है। व्यवहारात्मक जनवाद के आधार पर व्यवहार निर्वाह अर्थात् स्थापित मूल्यों का निर्वाह, शिष्ट मूल्य सहित प्रत्यक्ष होता है। जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य का अनुभव व मूल्यांकन होता है और शिष्ट मूल्य का आचरण होता है। उत्पादित वस्तु का उत्पादन, उपयोग एवं वितरण होता है।
बौद्धिक समाधान ही समाधानात्मक भौतिकवाद का आधार है। यही आधार स्वयं स्पष्ट करता है कि मानव के लिये समाधान एक प्रधान आयाम में, से, के लिये काँक्षित उपलब्धि है। चारों आयामों की प्राथमिकता क्रमश: अनुभव, विचार, व्यवहार और व्यवसाय है। अनुभव मूलक पद्धति से विचारों में समाधान, विचारानुरूप व्यवहार पद्धति से सहअस्तित्व एवं न्याय, नियम, नियंत्रण, संतुलन मूलक उत्पादन से समाधान, समृद्धि दृष्टव्य है।