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केवल उत्पादन ही मानव के लिए जीवन सर्वस्व नहीं है।
वस्तु मूल्य के आधार पर समाज संरचना संभव नहीं है। उत्पादन मानव जीवन का एक आयाम है। आचरण को प्रस्तुत करने हेतु पायी जाने वाली सीमा ही आयाम है। मानव के आयाम चतुष्टय सम्पन्न होने के कारण, इन्हीं के आधार पर स्वस्थ समाज की संरचना होती है। उत्पादन से समृद्धि का होना पाया जाता है। अन्य आयामों के अभाव में वह निर्मूल्य हो जाता है। व्यवहार ही वस्तु मूल्य को समुचित पद्धति से संयत करता है अर्थात् व्यवहार में ही वस्तु मूल्य की प्रयुक्ति हैं, जिसकी सदुपयोगिता मानवीयता पूर्ण व्यवहारिका में सिद्ध होती है। अमानवीयता की सीमा में सम्पूर्ण समृद्धि पूर्वक उभय आकाँक्षा से संबंधित सभी वस्तुओं के उपलब्ध रहते हुए मानव की परस्परता में विश्वास के अभाव में वे सभी साधन समाधान के लिए प्रयुक्त होने में असमर्थ पाये जाने जाते हैं। मानव जीवन में चतुष्टय आयाम वरीयता क्रम से अनुभव, विचार, व्यवहार एवं उत्पादन है। वैचारिक समाधान के बिना उत्पादन-विनिमय उपलब्धियाँ, अनुभूति के बिना अर्थात् सत्य में अनुभूति व मूल्यानुभूति के बिना व्यवहार में अभयता नहीं पायी जाती। व्यवहार में अभयता ही वैचारिक (बौद्धिक) समाधान का प्रधान कारण है। भय का तब तक रहना स्वाभाविक है जब तक मानवीयता पूर्ण सामाजिक संरचना अर्थात् “मूल्य त्रय” (जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य) पर आधारित सामाजिक संरचना न हो। मानवीयता पूर्ण समाज संरचना का अभाव ही है सामाजिक भय। यही व्यक्ति, परिवार एवं वर्ग की सीमा में अधिमूल्यांकन करने की बाध्यता है। वर्गवाद दूसरे वर्ग के दलन, दमन एवं शोषण के लिए प्रयास करती है। यह परस्पर प्रयास ही संघर्ष है। यही अंततोगत्वा युद्ध में परिणित होता है। इससे मुक्त होने का उपाय केवल मानवीयता पूर्ण संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था ही है। ये चारों मानवीयता में ही ध्रुवीकृत होते हैं अर्थात् अक्षुण्णता को प्राप्त करते हैं। फलत: मानव की परस्परता में विश्वास, उनके इतिहास में गौरव, भविष्य के लिए योजनाबद्ध कार्यक्रम एवं स्पष्ट रूपरेखा सिद्ध होती है जिसमें प्रत्येक मानव नैतिकता पूर्ण आचरण, व्यक्तित्व पूर्ण व्यवहार करने, प्रत्येक परिवार उसके सहयोगी बनने और समाज प्रोत्साहन एवं संवर्धन करने योग्य होता है। यही मानव की वांछित उपलब्धि है। इसी व्यवस्था में मनुष्य के चारों आयामों की एकसूत्रता पायी