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सर्वशुभ उदय का भास-आभास संवेदनशीलता की ही क्षमता है और प्रतीति व अनुभूति संज्ञानीयता की महिमा है।
अत: सर्वप्रथम सुख समाधान का भास-आभास संवेदनशीलता पूर्वक होता है। सुख, शान्ति, संतोष, आनन्द, न्याय, धर्म, सत्य सहज प्रतीति, अनुभूति यह संज्ञानशीलता की गम्यस्थली है। यही पूर्ण जागृति है। वस्तु स्थिति के साथ आशा, विचार, इच्छा एवं संकल्प का उत्कर्षन (तीव्र इच्छा) एवं उज्जवलता का होना अनिवार्य है। उत्कर्षता का तात्पर्य गतिशीलता से, उज्जवलता का तात्पर्य निर्भ्रमता से है। किसी न किसी सीमा में अनुभूति ही अग्रिम स्थितिवत्ता के प्रति अनुमान है। यही अनुमान अग्रिम प्रयोग का कार्यक्षेत्र तथा वस्तु है। अनुमान क्षमता ही प्रयोग व्यवहार एवं अनुभव के लिए संभावना, अवसर तथा बाध्यता है। यही बाध्यता ही प्रवृत्ति, निवृत्ति या वृत्ति है। प्रवृत्तियाँ भोगों में, वृत्तियाँ व्यवहार एवं आचरण में, निवृत्ति केवल अनुभव में आनंद के अर्थ में प्रायोजित होना पाया जाता है। अमानवीयता की सीमा में प्रवृत्तियाँ, मानवीयता में वृत्तियाँ एवं अतिमानवीयता में निवृत्ति मूलक क्रिया पायी जाती है।
“जागृति सहज अनुमान क्षमता मानव की विशालता को और अनुभव ही पूर्णता को स्पष्ट करता है।” सतर्कता एवं सजगता मानव जीवन में प्रकट होने वाली क्रियापूर्णताएं है। चैतन्य क्रिया अग्रिम रूप में क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता के लिये तृषित एवं जिज्ञासापूर्वक अपनी विशालता को अनुमान के रूप में प्रकट करती है। ज्ञानावस्था की इकाई का मूल लक्ष्य ही पूर्णता है। पूर्णता के बिना ज्ञानावस्था की इकाईयाँ आश्वस्त एवं विश्वस्त नहीं है। उत्पादन एवं व्यवहार में ही क्रमश: समाधान एवं अनुभव चरितार्थ हुआ है। प्रयोग एवं उत्पादन में ही समस्या एवं समाधान है। व्यवहार एवं आचरण में ही सामाजिक मूल्यों का अनुभव होने का परिचय सिद्ध होता है। आशा, विचार, इच्छा समाधान के लिए ही प्रयोग व उत्पादन विनिमयशील है। इच्छा एवं संकल्प अनुमानपूर्वक अनुभव के लिए प्रवर्तनशील है। आचरण के मूल में मूल्यों का होना पाया जाता है। स्वभाव ही आचरण में अभिव्यक्त होता है। मानवीय स्वभाव धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, करूणा ही है। अनुभव आत्मा में अनुभवमूलक व्यवहार एवं आचरण आत्मानुशासित होता है, आत्मानुभूति ही प्रमाण और वर्तमान है। आत्मानुभूति मूलक व्यवहार