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मानव जीवन में भक्ति जागृति के अर्थ में वांछित प्रक्रिया है।
भजन एवं सेवा का योगफल ही भक्ति है। भय से मुक्त होने के लिए किया गया कायिक, मानसिक एवं वाचिक क्रियाकलाप ही भजन है। तदानुकूल व्यवहार एवं आवश्यकता से अधिक उत्पादन तथा शेष का विधिवत् विवरण एवं परिचर्या ही सेवा है। भय मुक्ति के लिए परम सत्य में तन्मयता ही प्रधान आधार है। यह भक्ति की विशेषता है। तन्मयता ही क्रम से तदात्मयता एवं तद्रूपता भी है। इसके मूल में अर्पण-समर्पण अनिवार्य है। यह जागृत के साथ अर्पण-समर्पण पूर्वक ही चरितार्थ होती है। समर्पण का तात्पर्य पूर्णता हेतु प्रस्तुत होने से तथा अर्पण का तात्पर्य सेवा-सुश्रुषा से है। इनकी चरितार्थता उसी स्थिति में प्रत्यक्ष होती है जब जो जिसमें अर्पित-समर्पित होता है उसकी क्षमता तथा अर्पण-समर्पण की पूर्णता के योगफल में भक्ति चरितार्थ होती है अर्थात् तन्मयता से तदात्मयता तथा तदात्मयता से तद्रूपता सिद्ध होती है। जिसका प्रत्यक्ष रूप गुणात्मक परिवर्तन ही है। गुणात्मक परिवर्तन सिद्ध न हो ऐसी तद्रूपता, तदात्मयता एवं तन्मयता की मौलिकता सिद्ध नहीं होती है। गुणात्मक परिवर्तन का प्रमाण मानवीयता, देव मानवीयता एवं दिव्य मानवीयता में प्रमाणित होता है। जागृति ही तन्मयता का मूल उद्देश्य है अथवा उसकी चरितार्थता है। जागृति पूर्वक ही यह प्रमाणित होती है। जागृति न होने की स्थिति में इन सब प्रयासों का निरर्थक होना भावी है। निरर्थकता मानव की वांछित उपलब्धि नहीं है। उससे यह स्पष्ट होता है कि भक्ति में सफलता उभयाधिकार पर निर्भर करती है। सफलता ही प्रमाण एवं परम्परा है। क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता ही जीवन का चरमोत्कर्ष है। पूर्णता से अधिक उपलब्धि प्रमाण सिद्ध नहीं है। पूर्णता के लिए ही जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति श्रम, गति, परिणामशील है। पूर्णता से अधिक मानव में, से, के लिए आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता विहीन उपलब्धि के लिए प्रयास नहीं है। यदि है, सफल नहीं है। स्थापित मूल्य का अनुभव सहित शिष्टता पूर्ण आचरण ही भय मुक्ति का प्रत्यक्ष रूप है। स्थापित मूल्यानुभूति एवं शिष्टता के बिना भय मुक्ति नहीं है। भय मुक्ति के लिए तन्मयता में प्रसक्ति है। यह क्रम से अमानवीयता से विवश इकाई के लिए मानवीयता पूर्ण सेव्य, मानवीयता पूर्ण इकाई के लिए देव मानवीयता पूर्ण सेव्य, देव मानवीयता पूर्ण इकाई के लिये दिव्य मानवीयता सेव्य अथवा दिव्य मानवीयता