44.
अभयता का प्रत्यक्ष रूप ही वर्तमान में विश्वास है।
अभयता गुणात्मक परिवर्तन पूर्ण संस्कार की परिणति है। गुणात्मक संस्कार जागृति क्रम में ही होता है। यही क्रांति है। क्रांति ही संक्रमण प्रक्रिया है। संक्रमण प्रक्रिया मानव के लिए अमानवीयता से मानवीयता एवं मानवीयता से अतिमानवीयता में ही है। मानव मानवीयतापूर्ण जीवन में ही अभयता को प्राप्त करता है। मानवीयता पूर्ण सामाजिक जीवन में ही मानव में निहित अमानवीयता के भय से मुक्ति है। मानवीयता में अमानवीयता का अत्याभाव होता है। अमानवीयता में मानवीयता का भास, आभास एवं प्रतीति होती है। यही वास्तविकता अमानवीयता से मानवीयता में संक्रमण एवं संभावना को स्पष्ट करती है। मानवीयता में अमानवीयता का अत्याभाव होना ही मानवीयता की क्षरण विहीनता को सिद्ध करता है। क्षरण का तात्पर्य ऋणात्मक परिवर्तन से है। मानवीयता का ऋणात्मक परिवर्तन नहीं है। इसी प्रकार जीवावस्था अर्थात् गठनपूर्णता का ऋणात्मक परिवर्तन नहीं होता है और दिव्य मानवीयता का ऋणात्मक परिवर्तन नहीं होता है। ये ही तीन स्थितियों में तीन पूर्णताएं सिद्ध होती हैं। जीवावस्था अर्थात् चैतन्य पद में प्रतिष्ठित होने में गठनपूर्णता, मानवीयता में पदस्थ होने की क्रियापूर्णता एवं दिव्य मानव पद में प्रतिष्ठित होने में आचरणपूर्णता होती है। जड़- चैतन्यात्मक प्रकृति “पूर्णता त्रय” में, से, के लिए ही परिणामशील, श्रमशील एवं गतिशील है। प्रकृति की गम्यता अर्थात् विकास एवं जागृति की विशालता “पूर्णता त्रय” से अधिक कुछ भी नहीं है। चैतन्य जीवन का आरम्भ गठनपूर्णता से होता है। यही गुणात्मक परिवर्तन पूर्वक मानव पद को पाता है। मानव पद में ही शेष दो पूर्णता की संभावना स्पष्ट हुई है। इसमें से क्रियापूर्णता के अनन्तर आचरणपूर्णता सिद्ध होती है। क्रियापूर्णता के बिना मानव आश्वस्त, विश्वस्त नहीं होता है क्योंकि अमानवीयता में परस्पर उसको भय होता ही है क्योंकि हीनता, दीनता एवं क्रूरता पूर्वक मानव का विश्वस्त होना प्रमाणित नहीं है। विश्वास एवं अभयता अन्योन्याश्रित तथ्य हैं। अभयता के बिना विश्वास एवं विश्वास के बिना अभयता सिद्ध नहीं होती है। अमानवीयता का स्वभाव ही भय, प्रलोभन व आस्था है। मानवीयता का स्वभाव ही मानव सहज विश्वास है। “स्वभाव का अभाव नहीं है।” स्वभाव ही धर्मीयता को प्रकट करता है। संपूर्ण चैतन्य प्रकृति स्वभाव एवं धर्म