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व्यक्तित्व और प्रतिभा की चरमोत्कर्षता में ही प्रेमानुभूति होती है।
श्रृंगार व कामुकता प्रेमानुभव करने का साधन नहीं है अथवा वे इसके लक्षण नहीं हैं। प्रेम आवेश नहीं है। प्रेम अतिव्याप्ति, अनाव्याप्ति एवं अव्याप्ति दोष से मुक्त है। कामुकता प्रच्छन्न रूप में आवेश है अर्थात् सम्मोहनात्मक आवेश है। “प्रेमानुभूति में तन्मयता एवं अनन्यता स्वभावाभिव्यक्ति है।” अनन्यता ही अखण्ड सामाजिकता का द्योतक है। सामाजिकता की वास्तविकता ही अखण्डता है। प्रेमानुभूतिमयता में ही जीवन चरितार्थता एवं अभयता सिद्ध होती है। “मानव ही प्रेमी और प्रेमास्पद होने के लिए अर्ह है।” प्रकारान्तर से मानव जैसे ही प्रतीक प्रसिद्ध है। मानव ही मानव के लिए प्रेमानुभूति का सुलभ उपाय है। प्रेमानुभूति योग्य क्षमता में सामाजिकता का प्रकट होना स्वाभाविक है। स्वभाव ही इसका मूल रूप है। सामाजिकता स्वभाव में न हो, प्रेमानुभूति हो ऐसा प्रमाण नहीं है। प्रेमानुभूति पूर्ण मानव की स्वतंत्रतापूर्वक सामाजिकता की अभिव्यक्ति ही समाज के लिए उसकी उपादेयता है। प्रेमानुभूतिमयता की अभिव्यक्ति शिष्टता में अर्थात् आचरण में इंगित होती है। इंगित होना ही व्यंजना है। व्यंजना ही क्रम से भास, आभास, प्रतीति, अवधारणा एवं अनुभूति है। प्रेम दृश्य न होते हुए दृश्य पूर्वक व्यंजित होता है। यही अनन्यता की गरिमा है। अनन्यता स्वयं में दृश्य होते हुए अदृश्यात्मक प्रेममयता को व्यंजित कराती है। जैसे- अनुभव अदृश्य होते हुए भी प्रमाण एवं परंपरा है। प्रेममयता ही मानव में अनन्यता के रूप में प्रत्यक्ष होती है। ऐसी प्रेममयता के लिए ही सम्पूर्ण प्रकार के अभ्यास होते हैं। संपूर्ण प्रकार के अभ्यास की चरमोत्कृष्ट उपलब्धि प्रेमानुभूति ही है जो पूर्णतया सामाजिक एवं व्यवहारिक है। सामाजिकता एवं व्यवहारिकता में ही मानव की यथार्थता एवं वास्तविकता स्पष्ट होती है, न कि उत्पादन में।
“प्रेम ही स्वर्गीयता का आद्यान्त आधार है।” स्वर्गीयता का प्रत्यक्ष रूप ही अनन्यता है। परस्पर मानव में अनन्यता ही अखण्डता है। मानव में अखण्डता ही स्वर्ग है। प्रेमानुभूति में ही सर्वोच्च प्रकार की सामाजिकता प्रकट होती है। सामाजिकता में ही स्वर्गानुभूति होती है। उसके अभाव में क्लेश होता है। सामाजिकता स्थापित मूल्यानुभूति एवं उसकी निरन्तरता ही स्वर्ग-स्वर्गीयता,