22.
प्रत्येक मानव समाजिकता के लिए समर्पित होना चाहते है।
प्रत्येक मानव शुद्धत: संघर्ष, विषमता, द्रोह-विद्रोह को नहीं चाहता है। यह सब भ्रमित मानवकृत वातावरण के बाध्यतावश ही होता हुआ पाया जाता है। यही सामाजिकता के लिए अड़चन है। अखण्ड समाज व्यवस्था के बिना मानव में मानव चेतना प्रगट होना संभव नहीं है। मानव में विकास एवं जागृति के प्रति स्पष्ट ज्ञान, तदनुकूल आचरण, अनुसरण, संरक्षण, सहयोग व अध्ययन की न्यूनता ही सामाजिकता की अपूर्णता है। यह मानव के लिए वांछित एवं आवश्यक घटना नहीं है।
“निर्भ्रमता पूर्वक ही मानव चारों आयामों और दश सोपानीय परिवार सभा व्यवस्था में पूर्णता का अनुभव करता है।” यह पूर्णता समाधान, समृद्धि, अभय एवं सहअस्तित्व के रूप में प्रत्यक्ष होती है। पूर्णता मानव जीवन एवं प्रकृति की विकास क्रम एवं जीवन जागृति की संहिता है। जिसका सार्थक भाषाकरण ही संहिता है। यह सर्ववांछित उपलब्धि हैं। मानव के संस्कारों के अन्तरान्तरवश उनमें अध्ययन, अन्वेषण, अनुसंधान एवं दर्शन क्षमता में विविधता पायी जाती है। सार्वभौम सिद्धांत, नीति एवं पद्धति को पाना अर्थ के सदुपयोग एवं सुरक्षा के लिए अनिवार्यतम आवश्यकता है जिसके बिना शिक्षा एवं व्यवस्था में सार्वभौमिकता संभव नहीं है। फलत: संस्कृति सभ्यता में सार्वभौमिकता संभव नहीं है। यही सभ्यता मानवीयता की अपेक्षा में अमानवीयता का, अतिमानवीयता की अपेक्षा में मानवीयता का, व्यापाकता की अपेक्षा में अतिमानवीयता का, प्रकृति की अपेक्षा में व्यापकता का, क्रियाशीलता की अपेक्षा में प्रकृति का, ह्रास और विकास की अपेक्षा में क्रियाशीलता का, चार अवस्था की सृष्टि की अपेक्षा में ह्रास और विकास जागृति का विश्लेषण पूर्वक अध्ययन स्पष्ट है।
“मनुष्य निर्भ्रमता पूर्वक ही चारों आयामों तथा दश सोपानीय व्यवस्था में चरितार्थता का अनुभव करता है।”
संवेदनशीलता एवं संज्ञानशीलता का प्रमाण ही सामाजिकता है। संज्ञानशीलता सामाजिक मूल्यों का निर्वाह व अनुभव करती है। साथ ही शिष्ट मूल्य एवं वस्तु मूल्य का अनुभव करने वाली क्षमता संज्ञानशीलता ही है। मानव अल्प जागृत अवस्था में वस्तु मूल्य का, अर्ध जागृत अवस्था