12.
न्याय पाना, सही कार्य व्यवहार करना एवं सत्य सम्पन्नता ही साम्यत: जनाकाँक्षा है।
जब तक न्याय के संदर्भ में जन-मन गत मतभेद हैं, तब तक व्यवहारात्मक जनवाद नहीं है। व्यवहारिकता के विपरीत में अव्यवहारिकता ही दृष्टव्य है। यही विषमता, मतभेद, द्रोह-विद्रोह, आतंक, भय, संचय, वर्ग संघर्ष एवं युद्ध है या युद्ध के लिये तत्परता है। ये सब मानव के समाधान एवं समृद्धि के अवरोधक तत्व हैं। अन्याय एवं गलती के बिना समस्या एवं असमृद्धि का प्रसव नहीं है। इस प्रकार से मानव ही प्रतिभा एवं व्यक्तित्व के असंतुलनवश गलती एवं अन्याय में प्रवृत्त होता है। फलत: मंगल कामना रहते हुए भी वह अमंगलकारी कर्म करता है। अमंगलकारी कर्म व्यवहार, विचार परंपरा सामाजिकता के लिये सहायक सिद्ध नहीं हुई है। यही सत्यता मानव को मंगलदायी कर्म व्यवहार विचार में अनुगमन एवं अनुशीलन करने के लिये प्रेरणा है। यही अभ्युदयशीलता के लिये उदय, मंगलमयता के लिये मार्ग, मांगलिकतापूर्ण जीवन यात्रा एवं शुभ परंपरा की घटना है।
न्याय और समाधान सार्वभौम सत्य है। यह देश काल अबाध है। इसलिये मानव द्वारा किया गया संपूर्ण विचार एवं प्रयास तर्कसंगत या सतर्कतापूर्ण होने के लिये ही प्रत्येक मानव का समाधान एवं समृद्धि में, से, के लिये ही विचार, कर्म एवं व्यवहार करना प्रसिद्ध है। तर्क की सीमा में प्रतितर्क है। मूल वस्तु के अज्ञात व अस्पष्ट रहते हुए उसके तात्पर्य या फलवत्ता के संदर्भ में की गई प्रश्नोत्तर प्रक्रिया ही वाद-प्रतिवादी एवं तर्क प्रतितर्क है, जो समस्या की परंपरा है। तर्क समाधान नहीं है। समाधान एवं तात्विकता के लिये तर्क का प्रयुक्त होना ही उसकी चरितार्थता है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि तर्क का अस्तित्व स्वतंत्र नहीं है। साथ ही तर्क का प्रयोजन केवल तात्विकता से संबद्ध होना ही है। इसी प्रमाण सिद्ध साक्ष्य से स्पष्ट होता है कि तर्क सीमान्तवर्ती विचार, उपदेश एवं प्रचार मानव जीवन के लिये पर्याप्त नहीं है।
सतर्कता सहित समाधान, समाधान ही सार्वभौमता, सार्वभौमिकता ही निर्विषमता, निर्विषमता ही सत्यता, सत्यता ही यथार्थता, यथार्थता ही निर्भ्रमता, निर्भ्रमता ही अखण्डता, अखण्डता ही सफलता, सफलता ही सतर्कता है। सतर्कता सजगता ही सफल सामाजिकता का लक्षण है।