है। अस्तु, विवाह संस्कार का आद्यान्त अर्थ निष्पत्ति मानवीयतापूर्ण आचरण एवं मानव कुल का संरक्षण है।
दीक्षा संस्कार प्रत्येक मानव के लिए अनिवार्य है। “मानव धर्मीयता का अनुभव करने के लिए की गई प्रक्रिया, पद्धति एवं प्रणाली ही दीक्षा है।” दीक्षा संस्कार गुणात्मक परिवर्तन की ओर सुस्पष्ट दिशा निर्देशन के संदर्भ में ज्ञातव्य है। दिशा जागृति सहज प्रमाणों के क्रम में अग्रिमता को इंगित करता है। मानव जीवन जागृति क्रम में अमानवीयता से मानवीयता एवं मानवीयता से अतिमानवीयता की ओर है। शिक्षा द्वारा मानवीय अवधारणा को स्थापित किया जाना, दीक्षा द्वारा अनुभव एवं अतिमानवीयता की ओर दृढ़ता एवं गति को प्रस्थापित करना ही इन दोनों संस्कारों की चरितार्थता है, जो सर्व वांछनीय उपलब्धि है। मानवीय जीवन प्रतिष्ठा के बिना दीक्षा संस्कार सफल नहीं होता है। दीक्षा संस्कार स्वमूल्य और मौलिकता का अनुभव करने के लिए ही दिशादायी प्रक्रिया है। स्वमूल्याँकन मात्र अनुभव है क्योंकि “मूल्य” भी अनुभव प्रमाण ही है। यही अनुभव क्षमता पर मूल्य में निष्णातता है। पूर्णता एवं परिपक्वता की सम्मिलित प्रक्रिया ही निष्णातता है। स्वमूल्यानुभूति योग्य क्षमता ही सर्वोच्च जागृति है। यही क्रम से जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य, वस्तु मूल्य के वरीयता क्रम को प्रमाणित करता है। अनुभव योग्य क्षमता ही स्वमौलिकता है। अनुभव क्षमता ही क्रम से आचरण, व्यवहार एवं व्यवसाय में प्रकट होती है जिसकी प्रत्यक्ष उपलब्धि समाधान एवं समृद्धि है। मानव जीवन अनुभवमय है। जागृति के क्रम में यह एक संभावना एवं जागृति पूर्णता में उपलब्धि है। यही विशेषवत्ता जागृत को अजागृत में अवबोधन, प्रबोधन एवं निर्देशन पूर्वक अनुभव योग्य क्षमता, योग्यता, पात्रता को प्रस्थापित करने के लिए बाध्य करती है। यही दीक्षा संस्कार की गरिमा है। स्वागत पूर्वक स्वीकार्य योग्य बोध क्रिया ही अवबोधन क्रिया है, जिसकी चरितार्थता अवगत होने से है। आवश्यकता एवं अनिवार्यतापूर्वक स्वीकृति क्रिया से ही अवगत होने का तात्पर्य है।
दीक्षा ही व्रत, व्रत ही निष्ठा, निष्ठा ही सकंल्प , संकल्प ही दृढ़ता, दृढ़ता ही प्रबुद्धता, प्रबुद्धता ही श्रद्धा-विश्वास एवं प्रेम, श्रद्धा-विश्वास एवं प्रेम ही अनुभूति तथा अनुभूति ही दीक्षा है। मानव में, से, के लिए व्रत अवधारणा है जो सत्यवक्ता, इन्द्रिय संयमता, विचार संयमता, अस्तेय, अपरिग्रह, निरपराधिता, ब्रह्मचर्य (संज्ञानीयता में संवेदनायें नियंत्रित रहना), विवेकशीलता एवं गुणात्मक परिवर्तनशीलता है, जिनका प्रत्यक्ष रूप धीरता, वीरता, उदारता एवं दया, कृपा, करूणा की अभिव्यक्ति ही है। व्रत का तात्पर्य गुणात्मक परिवर्तन की दिशा में