29.
मानव में न्यायापेक्षा, सही करने की इच्छा और सत्य वक्ता होना जन्म से ही दृष्टव्य हैं।
जन्म के अनन्तर वर्ग, जाति, मत, सम्प्रदाय का आरोपण होता है। शुद्धत: प्रत्येक संतान केवल मानव संतान है। इसमें मानव से अतिरिक्त जाति, मत, संप्रदाय, वर्ग, बोध को उनके माता-पिता परिवार तथा प्रतिबद्ध समूह प्रस्थापित करते हैं जो एक पारम्परिक प्रक्रिया है। वह वर्ग सीमा से अधिक नहीं हैं। शैशवावस्था से ही तदाकार वृत्ति होती है। फलत: विभिन्न जाति, मत, सम्प्रदाय , धर्म, वर्ग को मानता है। फलत: उसी सीमा में स्व-अस्तित्व को मानता है। यह मान्यता उसको उस वर्ग के सीमावर्ती कार्यकलाप, आचरण, व्यवहार में प्रवृत्त होने के लिए बाध्य करता है। यह बाध्यताएं तब तक रहेगी जब तक किसी विशेष घटनावश उसमें विशिष्ट परिवर्तन न हो जाये। विशिष्टता का तात्पर्य मानवीयता एवं अतिमानवीयता पूर्ण जीवन में स्थिति को पा लेने से है। ऐसा व्यक्ति जिस परंपरा से उद्गमित हुआ रहता है उसी परंपरा में उसकी विशिष्टता एवं शिष्टता का समावेश करने के लिए प्रयास करता है। पहले से ही वह परंपरा किसी सीमा से सीमित रहने के कारण अनुभवमूलक तत्वों का समावेश करने में असमर्थ होकर उस व्यक्ति या व्यक्तित्व को एक आदर्श के रूप में वह परंपरावादी जनजाति स्वीकारता है। फलत: वह आदर्श एक स्मारक रूप में परिणत हो जाता है। इन तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्ग विहीन परंपरा को वहन करने के लिए मानवीयता के अतिरिक्त कोई भी उपाय परंपरा समर्थ नहीं हुआ है। उसका साक्ष्य केवल वर्ग संघर्ष एवं युद्ध ही है।
जो जिस मूल्य को अवधारणा में स्वीकारता है, उसी के अनुरूप उसमें स्वभाव का अवतरण होता है। मानवीय स्वभाव सिद्धि के लिये ही अवधारणाओं की स्वीकृति होती है। इसी प्रक्रियावश मानव जिस मूल्य को स्वीकार कर लेता है उसी मूल्य में, से, के लिए प्रस्तुत होता है। उन्हीं मूल्यों की अनुकूल सीमा तक अपनत्व को स्थापित करता है। उसी को सर्वस्व एवं सर्वश्रेष्ठ मान लेता है। यही वर्ग प्रतिष्ठा है। ऐसी सविरोधी वर्ग प्रतिष्ठाएं संघर्ष के लिए उत्प्रेरित होती है। प्रत्येक व्यक्ति का स्वविवेक से मानवीयता पूर्ण होना संभव नहीं हुआ है। जन्म से प्रत्येक व्यक्ति में कोई वर्ग प्रतिष्ठा नहीं रहती है, वर्ग सीमा में सीमित होने के अनन्तर स्वविवेक में सीमित