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सामाजिकता का आचरण
सामाजिकता का अध्ययन एवं अभ्यास अनिवार्य साधना है। मानव पाँच स्थितियों में गण्य है, जिसमें से तीन मूलरूप है - 1. व्यक्ति, 2. परिवार, 3. समाज, इसी के परिवर्तित दो रूप हैं - 4. राष्ट्र, 5. अंतर्राष्ट्र।
इन पाँचों स्थितियों का आचरण परस्पर पूरक है। यह दश सोपानीय व्यवस्था में स्पष्ट है।
आशा एवं आकाँक्षापूर्वक किया गया क्रियाकलाप ही आचरण है। आशयपूर्वक स्वादन क्रिया ही आशा है। जिस स्वादन के बिना सहअस्तित्व में दृढ़ता व सुरक्षा नहीं है, उसकी अपेक्षा ही स्वादन क्रिया का आशय है। मूल्य रुचि ग्राही क्रिया ही स्वादन है। मानव में संचेतना और गति का संयुक्त रूप ही क्रिया है। ऐसी क्रियाओं का समूह ही क्रियाकलाप है। मन में आस्वादन एवं चयन क्रिया प्रसिद्ध है। स्वागत क्रिया ही आकाँक्षा है। यही संचेतना एवं स्थितिवत्ताग्राही क्रिया में संचेतनशीलता का लक्षण है।
संचेतनशीलता ही स्वागत क्रिया का आधार है। जो जितना ही संचेतनशील होता है, उतना ही अन्य की वेदना, संवेदना, संज्ञानीयता एवं स्थितिवत्ता के संकेत को ग्रहण करता है। फलत: निराकरण के लिए प्रयास करता है। यही प्रयासोन्मुखता का आधार है।
मानव ही इस पृथ्वी पर अधिकाधिक संचेतनशील है। परस्पर मानव की संचेतनशीलता में जो अंतरान्तर है, उसी में अनन्यता को स्थापित करने के लिए प्रयास भी किया है। यही शिक्षा और अध्यापन कार्य की प्रेरणा भी है।
जागृतिशीलता का प्रत्यक्ष रूप ही संचेतनशीलता है, जिसका चरमोत्कर्ष ही अनुभव क्षमता है।
वेदना भ्रमवश होती है, संवेदना इन्द्रिय सन्निकर्ष के साथ होने वाली भंगुरता के आधार पर संज्ञानशीलता के लिए जिज्ञासा का स्रोत है। संवेदनशीलता के आधार पर ही संज्ञानशीलता की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। वेदना ही संवेदना एवं संवेदना ही संवेगों का मूल तत्व है। संचेतनामूलक पाँच मूल प्रवृत्ति हर्ष कारक, वेदनामूलक पाँच प्रवृत्तियाँ क्लेश परिपाकात्मक हैं। हर्ष ही मानव की वांछित उपलब्धि है, क्लेश नहीं।