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प्रमाण त्रय ही विश्वास है।
मानव में परिवार से अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था में, से, के लिए विश्वास विहीनता ही अपूर्णता है। अपूर्णता अविश्वास का द्योतक है। जीवन में अपूर्णता ही अध्ययन में अपूर्णता, अध्ययन में अपूर्णता ही प्रतिभा व व्यक्तित्व में अपूर्णता, प्रतिभा एवं व्यक्तित्व में अपूर्णता ही प्रबुद्धता में अपूर्णता, प्रबुद्धता में अपूर्णता ही प्रमाणिकता में अपूर्णता, प्रमाणिकता में अपूर्णता ही सामाजिकता में अपूर्णता, सामाजिकता में ही अपूर्णता ही वर्गीयता, वर्गीयता ही जीवन में अपूर्णता है। यही अपूर्णताएं अविश्वास अथवा विश्वास विहीनता है। इसके स्थान पर जीवन में पूर्णता ही अध्ययन में पूर्णता, अध्ययन में पूर्णता ही प्रतिभा एवं व्यक्तित्व में पूर्णता, प्रतिभा एवं व्यक्तित्व में पूर्णता ही प्रबुद्धता में पूर्णता, प्रबुद्धता में पूर्णता ही प्रमाणिकता में पूर्णता, प्रमाणिकता में ही पूर्णता ही सामाजिकता में पूर्णता, सामाजिकता में पूर्णता ही वर्ग विहीनता, वर्ग विहीनता ही अखण्ड समाज चेतना का प्रमाण एवं जीवन में पूर्णता है।
“प्रमाण व सिद्धान्त ही निर्विवाद है।” वास्तविकताओं को इंगित कराना ही प्रमाण का तात्पर्य है। विश्लेषण प्रक्रिया ही सिद्धान्त है। यही सार्वभौमिक सत्य, सत्यता, नीति, नियन्त्रण, स्थिति, परिस्थिति, जड़-चैतन्यात्मक “पूर्णता त्रय” प्रकटन प्रक्रिया को स्पष्ट करता है। फलत: मानव जीवन के चारों आयाम, दिशा व पाँचों स्थिति में विश्लेषित हुई है। यही “वाद त्रय” पूर्वक सहअस्तित्ववाद को प्रस्थापित किया है। यही विश्लेषण मानव जीवन की परम गरिमापूर्ण मध्यस्थता को प्रमाणित किया है। मानव जीवन में प्रमाणिकता प्रयोग, व्यवहार एवं अनुभूति ही है। आवश्यकीय सभी परिप्रेक्ष्यों एवं कोषों में मानव प्रमाणित होना ही प्रमाणिकता है। प्रमाणिकता का प्रसारण मानव जीवन में प्रसिद्ध है। यही जागृत मानव परंपरा को स्पष्ट करती है। मानव परंपरा में निर्विवादिता ही अभयता, अभयता ही विश्वास, विश्वास ही सहअस्तित्व, सहअस्तित्व ही अखण्डता, अखण्डता ही सामाजिकता, सामाजिकता ही मानवीयता, मानवीयता ही मानव के लिए प्रमाण एवं सिद्धान्त, प्रमाण एवं सिद्धान्त ही निर्विवाद है।
“विश्वास पूर्ण जीवन में प्रगतिशील कार्यक्रम विश्वास विहीनता पर्यन्त प्रतिक्रियावादी कार्यक्रम प्रसिद्ध है।” प्रगतिशीलता कार्यक्रम ही सतर्कता का द्योतक है जो समाधान निरंतरता है।