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पाण्डित्य ही मनुष्य में विशिष्टता हैं।
अनुभव योग्य क्षमता ही पाण्डित्य का प्रधान लक्षण है। यही मूल्यों सहित विशिष्टता को प्रकट करती है। ऐसी क्षमता जागृति सहज परंपरा में विधिवत् नि:सृत वास्तविकता है। प्रबुद्धता ही प्रमाण को प्रस्तुत करती है या प्रमाण प्रबुद्धता की निष्पत्ति है। संपूर्ण मूल्य अनुभव से प्रमाणित होते हैं। प्रत्येक मूल्यवत्ता स्वयं में स्वभाव है। यही स्थिति या स्थितिवत्ता है। स्थिति ही प्रकटन है। प्रकटन ही दृश्य है। दर्शन क्षमता के अनुसार दृश्य का दर्शन होना प्रसिद्ध है। यही मूल्याँकन प्रक्रिया है। दर्शन क्षमता ही मूल्याँकन प्रक्रिया का मूल तत्व है। यही स्थितिवत्ता की व्याख्या एवं विश्लेषण, प्रयोजन की अपेक्षा में होता है। मानव के लिए अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष से अधिक प्रयोजन नहीं है। इन प्रयोजनों का वरीयता क्रम मोक्ष, धर्म, अर्थ एवं काम है। इसी क्रम से सिद्धि, प्रतिबद्धता, प्रतीति एवं भास है। सिद्धि केवल सुख है, जिसकी चार स्थितियाँ प्रसिद्ध हैं जो सुख, शांति, संतोष एवं आनंद है। इन्हीं के प्रति प्रतिबद्धता, प्रतीति एवं भास होना मानव में प्रसिद्ध है। अनुभूति ही धर्म सिद्धि है। यही मोक्ष है। यह अतिमानवीयता पूर्ण जीवन में चरितार्थ होता है। मानवीयता पूर्ण जीवन में धर्म के प्रति प्रतिबद्धता होती है। यही समाज गठन का मूल तत्व है। यही स्वधर्मीयता का अनुभव करने एवं प्रसारण करने के लिए बाध्यता है। यही बाध्यता आचरण एवं व्यवहार पूर्वक संस्कृति व सभ्यता को व्यक्त करती है। प्रतिबद्धता पूर्वक ही मूल्यानुभूति होना पाया जाता है। स्थितिवत्ता का पूर्ण विश्लेषण ही मूल्यानुभूति है। मूल्यानुभूति ही निर्वाह क्षमता है। यह क्षमता ही प्रेरणा है। यही प्रेरणा व्यंजनोत्पादी प्रक्रिया है। इसके फलस्वरूप कार्यक्रम निष्पन्न होता है। “नीति त्रय” से अधिक कार्यक्रम नहीं है। इसका विधिवत् ज्ञान ही मानव, मानव के साथ व्यवहार करने के लिए तत्पर होता है। साथ ही व्यवहार गति में आवश्यकीय एवं अनिवार्य साधनों से संपन्न होने के लिए बाध्य होता है। फलत: शिष्ट मूल्य का प्रयोजन व वस्तु मूल्य का उपयोग सिद्ध होता है। यही समग्र कार्यक्रम का मूल कारण है। अनुभव में क्रम का विश्लेषण होता है। कारण-गुण-गणित से निर्णय होता है। उपलब्धि से ही क्रम एवं कार्यक्रम की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। क्रम ही विश्लेषण एवं उपलब्धि ही अनुभूति है। “मूल्य त्रय” से अधिक उपलब्धि नहीं हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव में विशिष्टता केवल