5.
सामाजिकता का अध्ययन
मनुष्य सामाजिकता के अध्ययन के लिए उत्साही है, मानव में, से, के लिए नहीं है। समाज का केन्द्र मनुष्य है। मानव जीवन चारों आयामों की एकसूत्रता है, जो स्थितिवत्ता है।
अध्ययन स्थितिवत्ता का ही है। स्थितिवत्ता ही सत्यता है। जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति की स्थितिवत्ता है। ज्ञानावस्थित मानव में ही अध्ययन क्षमता की विपुलता दृष्टव्य है। जो विकासक्रम उपलब्धि है, जिसका विश्लेषण हो चुका है।
स्थितिशील प्रकृति, स्थिति पूर्ण सत्ता ही प्रत्यक्ष है। स्थितिशीलता में ही वैविध्यता है, जो प्रकृति की सीमा है। स्थिति पूर्ण केवल सत्ता है यह अस्तित्व पूर्ण है। इसी में अनुभव जागृत ज्ञानावस्था सहज इकाई में होता है। स्थितिशील प्रकृति में परस्परता, प्रभाव, प्रतिभाव, व्यंजना एवं प्रतिव्यंजनात्मक क्षमता ही जागृत होकर दर्शन एवं प्रतिदर्शन क्रिया को प्रकट करती है। यही क्षमता स्थितिवत्ता का अन्वेषण करने के लिए बाध्य करती है, साथ ही स्थितिपूर्ण में अनुभूति के लिए भी।
दर्शन क्षमता प्रत्येक मानव में किसी न किसी अंश में पायी जाती है। दर्शन क्षमता के गुणात्मक जागृति की अभिलाषा से शिक्षा एवं अध्ययन की अनिवार्यता सिद्ध हुई है।
संपूर्ण अध्ययन स्थितिवत्ता का दर्शन, दर्शन ही ज्ञान एवं ज्ञान ही अनुभव है। अनुभव ही सत्य है और सत्य अपरिणामी है। प्रयोग और व्यवहार पूर्ण सिद्ध प्रमाण भी अनुभव ही है। दर्शन विहीन प्रयोग व व्यवसाय सिद्ध नहीं है।
अध्ययन के लिए जो प्रत्यक्ष संभावना है वह केवल उत्पादन, व्यवसाय, व्यवहार एवं उसके लिए समुचित क्षमता की सीमा में है, जो दर्शन ज्ञान और अनुभव ही है।
विश्लेषित स्वीकृत होना ही अध्ययन है। रूप, गुण, स्वभाव और धर्म की प्रत्यक्षानुभूति ही विश्लेषण है, जो स्थितिवत्ता व सत्य है। अस्तु, अध्ययन का फलन ही अनुभव है। अनुभव विहीन प्रत्येक उत्पादन कार्य में त्रुटि एवं व्यवहार कार्य में गलती अथवा अपराध भावी है।