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मानव में अखण्डता के लिए मानवीयता ही एकमात्र शरण है।
मानवीयता ही मानव समाज की धर्मीयता (समाधान) है। धर्मीयता विहीन इकाई नहीं है। रूप, गुण स्वभाव ही धर्मीयता में आश्रित हैं। यह प्रत्येक अवस्था में दृष्टव्य है। पदार्थावस्था में रूपवत्ता पूर्वक अस्तित्व धर्मीयता; प्राणावस्था में रूप गुणवत्ता पूर्वक पुष्टि धर्मीयता; जीवावस्था में रूप, गुण स्वभाववत्ता सहित जीने की आशा धर्मीयता; ज्ञानावस्था में रूप, गुण, स्वभाव धर्मवत्ता की सुख धर्मीयता प्रसिद्ध है। मानव जीवन का आद्यान्त मूल्य ही धर्म है। यही अनुभव क्षमता है। अनुभव केवल मूल्यों में, से, के लिए ही होता है। मूल्यानुभूति योग्य क्षमता के आधार पर ही अर्थ के सदुपयोग एवं सुरक्षा का निर्णय होता है। यही पोषण, शोषण, न्याय, अन्याय, उचित, अनुचित, सार्थक, असार्थक, सफलता, असफलता का निर्णय करने की क्षमता है। अनुभव का मूल आधार मानवीय मूल्य ही है। मानवीय मूल्य ही स्थापित एवं शिष्ट मूल्य है। जिसमें ही वस्तु मूल्य का समर्पित होना पाया जाता है। यही सफलता न्याय एवं अखण्डता का एकमात्र आधार है।
धर्म सफल जीवन को पाने के लिए मानव का सुसंस्कारपूत होना अनिवार्य है। सुसंस्कार गुणात्मक जागृति का द्योतक है। संस्कार विहीन मानव नहीं है। पूर्णता के प्रति प्राप्त प्रयासोदय ही सुसंस्कार है। मानवीयता एवं अतिमानवीयता ही सुसंस्कारों की आद्यान्त सीमा है। यही सुसंस्कार क्रिया एवं आचरणपूर्णता में परिणित होता है। यही गुणात्मक जागृति है। मानवीयता पूर्ण जीवन में ही आद्यान्त क्रियाकलाप मंगलमय होता है। क्योंकि इस जीवन में अनिष्ट चिंतन संभव नहीं है। अनिष्ट चिंतन के लिए विरोध का होना आवश्यक है। मानवीयता पूर्ण सामाजिक जीवन में परस्परता में मानव का निर्विषम होना सर्वप्रथम उपलब्धि है। यही स्वर्गीयता का प्रथम सोपान है। विश्वास का आधार है। वर्ग वाद के बिना मानव-मानव में विषमता का होना संभव नहीं है। वर्गीयता सामाजिकता का लक्षण नहीं है।
मानव के लिए ह्रास पूर्वक सहअस्तित्व, भय पूर्वक मंगलमयता को पाना संभव नहीं है। अमानवीयता पूर्वक मानव में ह्रास का प्रकाशन है अथवा अमानवीयता ही ह्रास का द्योतक है। इसलिए सर्वशुभ और मंगलमयता को पाना संभव नहीं है। इसका निराकरण केवल जागृति का