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मानवीयतापूर्ण जीवन में, से, के लिए सुसंस्कारों का अभाव नहीं है।
गर्भ संस्कार से ही मानव में संस्कार प्रक्रिया आरंभ होती है। गर्भावस्था में गर्भवती द्वारा किया गया धीरता, वीरता और उदारतापूर्ण एवं दया, कृपा, करूणा पूर्ण संभाषण एवं आचरण गर्भस्थ शिशु में उत्तम संस्कारों का कारण होता है। गर्भवती द्वारा किये गए व्यक्तित्व के स्मरण एवं आचरण गर्भस्थ शिशु में सुसंस्कारों के कारण होते हैं। गर्भवती में पायी जाने वाली सौम्यता, सरलता, पूज्यता, सौजन्यता, अनन्यता, सहजता, उदारता, सौहार्द्रता एवं निष्ठा पूर्ण आचरण गर्भगत शिशु में सुसंस्कारों का कारण होता है। गर्भवती द्वारा कृतज्ञता, श्रद्धा, गौरव, प्रेम, वात्सल्य, विश्वास, स्नेह, ममता एवं सम्मान की अनुभूतियाँ गर्भगत शिशु में सर्वोच्च संस्कारों का निर्माण करती है। गर्भ से संस्कारपूत शिशु में जन्म और जन्म के अनंतर सुसंस्कारों को ग्रहण करने में सुगमता होता है। गर्भवती के आहार, विहार, व्यवहार की संयमता गर्भगत शिशु में वरिष्ठ संस्कारों को प्रदान करती है। गर्भावस्था में शिशु में प्राण व रस का संचालन एवं पूर्ति गर्भवती के शरीर के क्रियाकलाप पर आधारित है। यही गर्भस्थ शिशु का वातावरण है। वातावरण का दबाव स्वाभाविक है। वातावरणस्थ क्रिया का संकेत प्रसारण प्रदायिता सहित प्रक्रिया ही वातावरण का दबाव है। चैतन्य क्रिया में वातावरणस्थ क्रियाओं के संकेत ग्रहण एवं प्रसारण प्रक्रिया को पाया जाता है। गर्भस्थ शिशु के शरीर के साथ चैतन्य क्रिया का होना स्वाभाविक है। अस्तु, गर्भस्थ शिशु का वातावरण शुभद होने के लिए जो निश्चित पद्धति वर्णित है उसके विपरीत अर्थात् अमानवीयता पूर्ण जीवन यापन पूर्वक सुसंस्कारपूत संतान को पाना संभव नहीं है।
“जन्म समय में भी संस्कारों का अभाव नहीं है।” अर्थात् स्वीकृतियों का अभाव नहीं है। चैतन्य इकाई में ही संस्कारों का होना पाया जाता है। सुसंस्कार ही गुणात्मक परिवर्तन के लिए मूल तत्व है। कुसंस्कार ह्रास के लिए कारण होता है। सुसंस्कारीयता विहीन पद्धति से जागृति में संक्रमित होना संभव नहीं है। जागृति के लिए प्रत्येक मानव इकाई बाध्य है। इस सत्यतावश मानव जागृति योग्य संस्कारीय कार्यक्रम को अपनाने के लिये विवश है। अस्तु, मंगलमय कामनापूर्ण वातावरण का जन्म समय में निर्माण करने से, कोलाहल विहीन वातावरण को बनाए