संज्ञानशीलता ही चैतन्य क्रिया की विशेषता है जिसमें आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति क्रिया संपन्न होती है। अस्तित्वपूर्णता की अनुभूति होती है। यही स्थिति सत्य में अनुभूति है। स्थितिशीलता में ही विकास क्रम दृष्टव्य है। स्थितिशील प्रकृति का सत्ता में सम्पृक्त रहना ही सहअस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण है। व्यवसाय में नियम, व्यवहार में न्याय, विचार में धर्म एवं अनुभूति में सत्य है। वस्तु स्थिति एवं वस्तुगत सत्य का दर्शन होता है। यह दर्शन करने वाली एवं अनुभव करने वाली क्रिया चैतन्य ही है। चैतन्य प्रकृति ही ज्ञानावस्था में जागृति पूर्वक पूर्णता को प्रकट करता है। इसी क्षमता में सजगता एवं सतर्कता का प्रमाण होना प्रसिद्ध है।
“पाण्डित्य अनुभूति का, कुशलता शिष्टता एवं कला पक्ष का, निपुणता उपयोगिता एवं यांत्रिकता का अध्ययन व प्रमाण है।” यह अध्ययन समुच्चय है। यही क्रम से समृद्धि, समाधान एवं अभयता है। यही मानव का आद्यान्त अभीष्ट है। निपुणता एवं कुशलता ही व्यक्तित्व तथा पाण्डित्य ही प्रतिभा है। व्यक्तित्व विहीन प्रतिभा सामाजिक सिद्ध नहीं होती है। प्रतिभा विहीन व्यक्तित्व समृद्ध नहीं होता है। व्यक्तित्व और प्रतिभा की संतुलित उपलब्धि के बिना जीवन सफल नहीं है। निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य क्रमश: संवेदनशीलता एवं संज्ञानशीलता की ही अभिव्यक्ति एवं उपलब्धि है। यह तत्वत: अनुभव मूलक गति की गरिमा है। जीवावस्था में संवेदनशीलता का प्रकाशन है। पदार्थावस्था एवं प्राणावस्था में कम्पनात्मक गति रहती है। निपुणता का प्रकाशन जीवावस्था व जीवावस्था के पूर्व स्वेदज प्रकृति से आंरभ होता है। प्रत्येक जीव किसी एक क्रिया में निपुण होता है। जैसे - चींटी, दीमक, मधुमक्खी संग्रह एवं आवास रचना में, व्याघ्र हिंसा कार्य में, पक्षी उड़ान भरने में, मेंढक ऋतु को पहचानने में विशेष निपुणता को प्रकट करते है। साथ ही व्याघ्र, चींटी या पक्षी का कार्य करने में असमर्थ सिद्ध हुआ है। इस सत्यता से यह स्पष्ट हो जाता है कि आवश्यकता के आधार पर जीवन ही आवश्यकता को उपलब्ध करने का प्रयास जीवावस्था से ही आरम्भ हुआ है। निपुणता का प्रारूप इसी अवस्था में प्रत्यक्ष हुआ है। इस प्रकार प्रत्येक जीव किसी न किसी क्रिया में निपुणता को प्रकट करता रहा है जबकि मानव अनेक क्रियाओं में निपुण होने का अधिकारी है और होता है। मानव में निपुणता की अभिव्यक्ति उपयोगिता मूल्य को स्थापित करने में स्पष्ट हुई है। यह क्रम से प्रकृति के विकास एवं जागृति क्रम में पायी जाने वाली उपलब्धि है। परंपरा ही इतिहास को स्पष्ट करती है। परंपरा रूपी इतिहास में विश्वास होना स्वाभाविक है जैसे यथार्थता, वास्तविकता, सत्यता सहज उद्घाटन जागृति को जागृति के रूप में पहचाना जाता है। पीढ़ी से पीढ़ी में स्वीकार होता है। दूसरा हर पीढ़ी में जागृति