स्वीकृत होता है। इस वर्तमान में परंपरा में न होते हुए भी यह अपेक्षा के रूप में सर्वाधिक मानव में होना पाया जाता है।
अनावश्यक घटनाओं के इतिहास विगत होते जाते हैं, वर्तमान में रहते हैं। विवशतावश युद्ध की तैयारी भी की जाती है, दोहराना भी पाया जाता है। यही स्पष्ट घटनाएं मानव को प्रेरित करता है कि इससे मुक्ति कैसे हो। इसलिए मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद की प्रस्तुति हुई।
पदार्थावस्था में रूप प्रधान परंपरा, प्राणावस्था में गुण प्रधान परंपरा, जीवावस्था में स्वभाव प्रधान परंपरा एवं ज्ञानावस्था में धर्म प्रधान परंपरा प्रसिद्ध है। ये चारों परंपराएं क्रमश: इन चारों अवस्थाओं के लिए आधार है। जबकि प्रत्येक अवस्था की प्रत्येक इकाई में रूप-गुण-स्वभाव-धर्म अविभाज्य रूप में समाये रहते हैं। यही अवस्था विशेष का इतिहास है। अभिव्यक्ति ही परंपरा है। विकास के क्रम में अवस्थाएं दृष्टव्य हैं। अवस्थानुरूप ही संप्रेषणा, प्रकाशन व अभिव्यक्ति के लिए प्रवृत्ति हैं। इन प्रवृत्तियों का प्रकटन सहअस्तित्व सहज वातावरण है। अवस्थानुरूपीय प्रकाशन इकाई में स्वीकृत होता है। फलत: प्रकाशन होती है। इसी क्रम में परंपरा एवं इतिहास की श्रृंखला होती है। मनुष्येत्तर तीनों अवस्था की सृष्टि में पारंपरिक वैविध्यता नहीं है। जबकि मानव का अनेक परंपरा में होना उसकी वैविध्यता को स्पष्ट करता है। प्रकृति की इस ऐतिहासिक स्थिति से ज्ञात होता है कि मनुष्येत्तर सभी सृष्टि अपनी परंपरा से विचलित नहीं है। साथ ही मानव का भ्रमवश विचलित होना पाया जा रहा है। इसका साक्ष्य अनेक परंपरा, वर्ग, संघर्ष एवं युद्ध है या युद्ध में तत्परता है। मानव की विशुद्ध परंपरा जागृति मूलक धर्म पर आधारित है। ज्ञानावस्था का धर्म केवल सुख है। इसी की चार स्थितियाँ सुख, शांति, संतोष, आनंद के रूप में वर्णित हैं। “मानव धर्म एक, समाधान अनेक।” प्रत्येक समाधान का तर्क और ऊहा पर आधारित होना आवश्यक है। ऊहा का तात्पर्य कल्पना से है। तर्क का प्रतितर्क, ऊहा की प्रत्यूहा मानव में पाये जाने वाले प्रसव एवं तदर्थ प्राप्तोदय (फल-परिणाम) का योगफल है। अनुभव से अधिक उदय तथा उदयानुषंगी विचार प्रसव मानव में प्रसिद्ध है। संपूर्ण उदय विस्तार अनुमान क्रिया है। इसी विस्तार की पृष्ठभूमि पर और आशा, विचार, इच्छा एवं कल्पना, आकाँक्षा का प्रसवित होना पाया जाता है। यही प्रत्यूहा एवं प्रतितर्क की प्रक्रिया है। यह प्रत्येक मानव के लिए प्राप्तभावी है। यही मानव के लिए विशाल अवसर है। मानव परम्परा शुद्धत: समाधान रूपी धर्म पर आधारित होने से ही उसकी ऐतिहासिक परम्परा सिद्ध होती है। मानव में धर्म साम्यता मानवीयता सहज वैभव में स्पष्ट है। अस्तु, मानवीयता पूर्ण संस्कृति, सभ्यता एवं विधि, व्यवस्था