अनुभव योग्य क्षमता ही है। यही गुणात्मक परिवर्तन का लक्ष्य एवं उपलब्धि है। लक्ष्य एवं उपलब्धि के मध्य में कार्यक्रम समाया है। प्रत्येक उपलब्धि कार्यक्रम पूर्वक ही उपलब्ध होती है। यह गुरू मूल्यन अर्थात् गुणात्मक परिवर्तन प्रक्रिया से सिद्ध होता है। यही प्रत्येक मानव का अभीष्ट है। प्रबुद्धता पर्यन्त विचार, व्यवहार, उत्पादन, उपयोग, सदुपयोग एवं प्रयोजनशीलता प्रक्रिया में गुणात्मक परिवर्तन भावी है। इसी कारणवश संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था में गुणात्मक परिवर्तन एवं परंपरा अवश्यंभावी है। इन सभी का गुणात्मक परिवर्तन ही पाँचों स्थितियों में गुणात्मक परिवर्तन है। इन सबकी गुरू मूल्यनीयता का अंततोगत्वा अनुभव योग्य क्षमता में समाहित रहता है। यही सभी स्तर पर प्रामाणिक जीवन का आधार है। इसी आधार पर सार्वभौमिकता सिद्ध होती है। प्रमाण का विरोध स्वीकार्य नहीं है। प्रमाण विफल नहीं होता है।
“विधि ही विधान; विधान ही विज्ञान व विवेक; विज्ञान व विवेक ही निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य; निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य ही विचार, इच्छा एवं संकल्प; विचार, इच्छा एवं संकल्प ही समाधान एवं अनुभूति; समाधान एवं अनुभूति ही उत्पादन, व्यवहार व व्यवस्था; उत्पादन, व्यवहार व व्यवस्था ही समृद्धि एवं सहअस्तित्व; समृद्धि एवं सहअस्तित्व ही सामाजिकता; सामाजिकता ही अभय; अभय ही अनुभूति; अनुभूति ही प्रमाण; प्रमाण ही प्रबुद्धता; प्रबुद्धता ही विधि है।” विचार गुणात्मक परिवर्तन पूर्वक ही प्रबुद्धता को प्रकट करता है। वास्तविकताओं के दर्शन पूर्वक पूर्णतया स्वीकृति पर्यन्त विचार में गुणात्मक परिवर्तन भावी है। अध्ययन प्रदर्शन, प्रकाशन में निहित तत्व के अनुरूप अवधारणा एवं प्रतिबद्धता स्थापित होती है। यही अवबोधन प्रक्रिया का प्रत्यक्ष रूप है। अवबोधन क्षमता से विचार परिवर्तन प्रक्रिया सम्पन्न होती है। मानव में होने वाले संपूर्ण विचार “तात्रय” रूप में ही अभिव्यक्त होते हैं। उनमें से अमानवीयता की सीमा में किये गये वैयक्तिक, सामूहिक एवं समग्र जनजाति की कार्यक्रम विफलता, पराभव एवं निष्फलता में परिणत होते हैं। मानवीयता एवं अतिमानवीयता पूर्ण पद्धति से प्रत्येक मानव में गुणात्मक परिवर्तन होना प्रसिद्ध है। प्रबुद्धता ही व्यवस्था को स्थापित करती है या व्यवस्था की स्थापना प्रबुद्धता से ही होती है। व्यवस्था उत्पादन एवं विनिमय के अर्थ में भी चरितार्थ होती है। भौतिक समृद्धि एवं बौद्धिक समाधान प्रसिद्ध है। बौद्धिक समाधान का तात्पर्य विचार में गुणात्मक परिवर्तन अर्थात् अनुभव योग्य क्षमता निर्माण करने के लिए शिक्षा अर्थात मूल्यग्राही एवं प्रदायी कार्य में पारंगतता से है। इसका प्रत्यक्ष रूप स्थापित मूल्यों की शिष्ट मूल्य सहित एवं वस्तु मूल्य समेत अभिव्यक्ति है। वस्तु उत्पादन का विपुलीकरण करने के लिए साधन एवं प्रतिभा का समुचित संयोजन किया जाना भी व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण कार्य