में दृष्टव्य है। चैतन्य क्रिया में क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता होना पाया जाता है। ऐसी पूर्णता को पाने के लिए ही समाज संरचना का होना उसकी चरितार्थता का द्योतक है।
“आवश्यकता, अनिवार्यता, अपरिहार्यता ही मानव में मूल्यग्राही एवं मूल्यप्रदायी क्षमता को उत्पन्न करती है।” मूल्यग्राही क्षमता का आरंभ जड़ प्रकृति में भी दृष्टव्य है। मूल्यप्रदायी क्षमता केवल चैतन्य प्रकृति में ही स्पष्ट होता है। जीव प्रकृति में ममता की अभिव्यक्ति विशेषकर मातृपक्ष से हुई है। प्रत्येक जीव अपनी संतान को किसी आयु सीमा तक संरक्षण एवं पुष्टि प्रदान करता हुआ देखा जाता है। यही ममत्व की मौलिकता है। प्राणावस्था एवं पदार्थावस्था में मूल्य प्रदायी क्रिया अदृष्ट है। चैतन्य प्रकृति में विशेषकर मानव में मूल्यग्राही एवं मूल्य प्रदायी क्षमता का प्रकटन हुआ है। अपेक्षाकृत अधिक मूल्य ग्रहण एवं कम मूल्य प्रदान करने की सीमा तक मानव मानवीयता से संपन्न नहीं है। यह लक्षण अमानवीयता में दृष्टव्य है। मानवीयता में मूल्य ग्रहण एवं मूल्य प्रदान का संतुलन अथवा मूल्य प्रदान की अधिकता पायी जाती है। अतिमानवीयतापूर्ण जीवन में अपेक्षाकृत कम मूल्य ग्रहण एवं अधिक मूल्य का प्रदान स्वभाविक होता है। यह जागृति सहज परंपरा में पायी जाने वाली निष्पत्ति है। इस विश्लेषण से भी यह स्पष्ट होता है कि मानव मानवीयता में मूल्य ग्राही एवं मूल्य प्रदायी कार्यक्रम को समाधानपूर्वक सम्पन्न करने का अधिकारी है। इस अधिकार का पाँचों स्थितियों दश सोपानीय परिवार सभा व्यवस्था के रूप में चरितार्थ होना ही उपलब्धि है। यह उपलब्धि स्वयं में अखण्डता है। अखण्डता स्वयं में सामाजिकता एवं अभय है। यह समष्टि प्रयास का योगफल है। समष्टि एक इष्ट में है ही। उसके योग्य कार्यक्रम संपन्न हो जाना ही उपलब्धि है। यही व्यवहारिक विश्वसन का प्रत्यक्ष रूप है। उत्पादन विनिमय आश्वासन, उसके योग्य समुचित शिक्षण, साधन एवं विनिमय सुलभता का योगफल है। मानव, मानव प्रकृति के साथ स्थापित मूल्यों का निर्वाह शिष्ट मूल्यों सहित मानवीयता पूर्ण जीवन में करता है। यह प्रमाण सर्वदा दृष्टव्य है। आवश्यकता पूर्वक ही कला मूल्य एवं उपयोगिता मूल्य की स्थापना होती है। साथ ही उपयोग, वितरण और सेवा, समर्पण तथा ग्रहण क्रिया में वे प्रयोजित होते हैं। आवश्यकता का मानवीयता में संयत होना पाया जाता है। इसी में अपव्यय का अभाव होता है। अपव्यय ही मानव जीवन में परम घातक प्रक्रिया है। अपव्ययता से अपव्यययी का अनिष्ट होना भावी है। व्यक्ति में जागृति परिवार के लिए इष्टकारी, परिवार का विकास एवं जागृति समाज के लिए इष्टकारी, समाज का विकास एवं जागृति राष्ट्र के लिए इष्टकारी तथा राष्ट्र का विकास एवं जागृति अंतर्राष्ट्र के लिए इष्टकारी एवं स्वीकार्य है। इसके साक्ष्य में यह देखा जाता है कि एक व्यक्ति द्वारा किया गया अविष्कार अनेक से स्वीकार्य होता