कर्माभ्यास पूर्वक भौतिक समृद्धि, व्यवहाराभ्यास पूर्वक बौद्धिक समाधान एवं चिंतनाभ्यास और अनुभव पूर्वक परमानन्द की निरंतरता है।
“जड़-चैतन्यात्मक स्थितिवत्ता में जो व्यवस्था है वही नियति क्रम है।”
मानव जीवन में न्याय सम्बद्धता व्यवहार में सार्थक है।
नियंत्रण पूर्वक व्यवस्था ही न्याय शास्त्र एवं नियंत्रण क्रम व्यवस्था है। नियंत्रण ही विधि और क्रम ही नीति है और समाधान ही व्यवस्था है। आचरण रूपी विधि एवं व्यवस्था मानव इकाई में पूर्णता सहज प्रमाण सम्बद्ध है। जागृत इकाई का स्वनियंत्रित होने का स्वभाव है। मानव इकाई में जीवन सहज गठनपूर्णता, क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता प्रमाणित होती है इसलिए पूर्णता की दिशा में व्यवस्था का अनुसरण ही अभ्यास का प्रधान लक्षण है।
नियंत्रण विहीन व्यवस्था नहीं है। विकास एवं ह्रास नियंत्रणपूर्वक ही है, इसीलिए सम-मध्यस्थात्मक व्यवस्था विकास की ओर प्रगतित एवं विषमतायुक्त व्यवस्था ह्रास की ओर विगतित होना पाया जाता है।
जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति का अभीष्ट विकास क्रम, विकास एवं जागृति क्रम, जागृति पूर्णता ही है, इसलिए प्रत्येक इकाई का ह्रास व विकास एवं जागृति उनकी मौलिकता से प्रमाणित है।
मौलिकता ही इकाई का स्वभाव, स्वभाव ही आचरण है।
प्रकृति में ऐसी कोई इकाई नहीं है जिसमें आचरण न हो।
मानव में “तात्रय (अमानवीयता, मानवीयता, अतिमानवीयता)” सीमान्तवर्ती स्वभाव और आचरण प्रत्यक्ष है।
मानव मध्यस्थ क्रिया के अनुसरण पूर्वक ही जागृतिशील है। यह जागृति की एक अवस्था का द्योतक है। मानव में ही मध्यस्थ को अनुसरण करने का अवसर है। सम-विषम के नियन्त्रण का आधार मध्यस्थ है, साथ ही मध्यस्थ क्रिया ही समाधान है अन्यथा प्रत्येक द्वन्द्व समस्या जनक है।
पदार्थावस्था में सामूहिक, प्राणावस्था में वर्गीय, जीवावस्था में जातीय एवं ज्ञानावस्था में भ्रमवश सामुदायिक बाध्यताएं दृष्टव्य हैं। जागृति पूर्वक अखण्डता, सार्वभौमता सूत्र व्याख्या है।
“जागृत मानव में अखण्डता ही सामाजिकता है।”