उत्पादन ही कर्माभ्यास, व्यवहार ही विचाराभ्यास एवं अनुभव संयोग ही चिंतनाभ्यास है।
विचार के अभाव में उत्पादन व व्यवहार शरीर द्वारा संपन्न नहीं होता है।
चैतन्य शक्तियों की प्रखरता से परिपूर्ण होने के लिए चिंतन अभ्यास अनिवार्य है।
मानव जागृत होने के लिए अभ्यास करता है। यह क्रम जागृति पूर्णता तक रहता है।
कर्माभ्यास के लिए भौतिक शास्त्र, व्यवहाराभ्यास के लिए बौद्धिक शास्त्र एवं चिंतनाभ्यास के लिए अनुभव मूलक मध्यस्थ दर्शन प्रसिद्ध है।
नियंत्रण को व्यंजित कराने योग्य प्रसारण-क्रिया ही शास्त्र है। प्रसारण की चरितार्थता ही व्यंजनीयता है।
स्थितिपूर्ण सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति का अनुभव बोध एवं रूप, गुण, स्वभाव तथा धर्मात्मक प्रकृति की स्थितिवत्ता में व्यंजित कराने हेतु प्रसारण एवं व्यंजनीयता है।
व्यंजनीयता ही भास, आभास एवं प्रतीति है। यह संस्कार एवं अध्ययन का फल है और साथ ही अभ्यास एवं अध्ययन के लिए प्रेरणा एवं गति भी है। सम्पूर्ण व्यंजनीयता शब्द व अर्थों को, स्थिति-गति रूप में स्वीकार करने की क्रिया है। यह सम्पूर्ण मानव में सार्थक होने वाली स्थिति नित्य समीचीन है।
चैतन्य प्रकृति रूपी मानव द्वारा लक्ष्य के अर्थ में अर्जित स्वभाव ही संस्कार है। आगन्तुक अथवा भ्रमित प्रवृत्ति तब तक भावी है, जब तक संस्कार समझदारी पूर्ण न हो जाये।
अमानवीयता की सीमा में संस्कार विकृत, मानवीयता की सीमा में सुसंस्कार एवं देव, दिव्य मानवीयता की कोटि में संस्कार पूर्ण होता है जो स्पष्ट है।
क्रिया शक्ति में कर्माभ्यास, इच्छाशक्ति में व्यवहाराभ्यास एवं शास्त्राभ्यास तथा ज्ञान शक्ति में चिंतनाभ्यास प्रसिद्ध है।
“जिस तथ्य को मानव समझ चुका है, समझ रहा है या समझने के लिए बाध्य है, वही प्रसिद्ध है।”
कर्माभ्यास से प्रतिफल, व्यवहाराभ्यास से सहअस्तित्व साक्षात्कार और चिंतनाभ्यास से संस्कार में गुणात्मक परिवर्तन फलत: अनुभव है जो प्रत्यक्ष है।