विश्लेषण स्पष्ट हो चुका है। परंपरा की स्वीकृति ही प्रतिबद्धता है। स्वस्थ परंपरा केवल मानवीयता पूर्ण सामाजिक होती है। वर्गीय एवं पारिवारीय व व्यक्तिवादी परंपरा संघर्ष एवं व्यक्तिवादिता से मुक्त नहीं है फलत: सामाजिक नहीं है। परंपरा सामाजिक या वर्गीय ही है। वर्गीय चेतना की परंपरा का अखण्डता में परिवर्तित होना संभव नहीं है। वर्ग मान्यता का सीमा से सीमित होना आवश्यक है। सामाजिकता सीमा नहीं अपितु अखण्डता है। प्रतिबद्धताएं संकल्प पूर्ण प्रवृतियों के रूप में प्रकट होती है जो उनके आहार, विहार, आचरण, व्यवहार, उत्पादन, उपभोग, वितरण और दायित्व, कर्त्तव्य निर्वाह के रूप में प्रत्यक्ष होती है। संकल्प में परिवर्तित होना ना होना ही अवधारणा है। ऐसी अवधारणा भास, आभास, प्रतीति पूर्वक ही होती है जबकि धारणा संक्रमण ज्ञानपूर्वक स्वीकृति है जिसे शिक्षा ही स्थापित करती है। प्रथम शिक्षा माता-पिता, द्वितीय शिक्षा परिवार, तृतीय शिक्षा केन्द्र, चतुर्थ शिक्षा व्यवस्था सहज वातावरण है जिसमें प्रचार, प्रदर्शन, प्रकाशन प्रक्रिया भी हैं। यही शिक्षा मानव में अवधारणा स्थापित करती है। फलत: मानव “तात्रय” के रूप में अपने आचरण को प्रस्तुत करता है। यही मानवीयता, देव मानवीयता, दिव्य मानवीयता है।
अवधारणा का स्थापन कार्य जागृत परिवार में जन्म से ही आरम्भ होता है, जागृत मानव परंपरा रूप में युवा अवस्था तक में दृढ़ हो जाता है, प्रौढ़ावस्था में अवधारणा प्रमाण पुष्टि होता है। शैशव व बाल्यावस्था में अवधारणाएं सुलभत: स्थापित होती है। ऐसे समय से ही मानवीयतापूर्ण संस्कृति की स्थापना तदनुरूप शिक्षा दश सोपानीय व्यवस्था में एकरूपता को पा लेना ही अखण्डता की प्रत्यक्ष उपलब्धि है।
मानवीयता पूर्ण परंपरा के मूल में मंगल कामना समायी रहती है। ऐसी उदात्त मंगल कामना व्यवहारानुगमन में सार्थक होता है।
अवधारणा ही संस्कार है। संस्कार विहीन मानव नहीं हैं। संस्कार प्रदाता केवल चार अवस्था में पायी जाने वाली शिक्षा ही है। इस शिक्षा एवं शिक्षण समुच्चय को मानवीयता से परिपूर्ण किया जाना ही अखण्डता की स्थापना है। यही क्रम अखण्ड सामाजिकता की अक्षुण्णता है। यही सर्वमंगल, शुभ, धर्म की सफलता है।
“मानव में अखण्ड समाज परंपरा ’तात्रय’ में ही अभिव्यक्त होता है।” जागृत मानव सहज अभिव्यक्ति के लिए इससे अधिक कोई वस्तु नहीं है। समाज के लिए सहायक तत्व ही विधि, असहायक तत्व ही निषेध है, जो मानवीयता एवं अमानवीयता की सीमा में स्पष्ट हो चुकी है।