शरीर द्वारा क्रियाकलापों को सम्पादित करने में समर्थ नहीं है। यही संचेतनशीलता है। सुरक्षा एवं सदुपयोग क्षमता सम्पन्न होने के लिए ही दर्शन एवं सहअस्तित्व चिंतन है।
सामाजिकता का अनुसरण आचरण तब तक संभव नहीं है जब तक मानवीयतापूर्ण जीवन सर्वसुलभ न हो जाय। ऐसी सर्वसुलभता के लिए शिक्षा और व्यवस्था ही एकमात्र दायी है, जिसके लिये मानव अनादिकाल से प्रयासशील है। प्रत्येक मानव को सतर्कता एवं सजगता से परिपूर्ण होने का अवसर है, जिसको सफल बनाने का दायित्व शिक्षा एवं व्यवस्था का ही है। सफलता और अवसर का स्पष्ट विश्लेषण ही शिक्षा है। प्रत्येक मानव सही करना चाहता है और न्याय पाना चाहता है साथ ही सत्यवक्ता है। ये तीनों यथार्थ प्रत्येक मानव में जन्म से ही स्पष्ट होते हैं। यही अवसर का तात्पर्य है। इन तीनों के योगफल में भौतिक समृद्धि एवं बौद्धिक समाधान की कामना स्पष्ट है। यह भी एक अवसर है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए अवसर का सुलभ हो जाना ही व्यवस्था की गरिमा है। न्याय प्रदान करने की क्षमता एवं सही करने की योग्यता की स्थापना ही शिक्षा की महिमा है।
“मानव संवदेनशीलता वश ही स्व-पर एवं अन्य अनन्यता के मूल रूप का भी अध्ययन करना चाहता है।” यही सहअस्तित्व का मूल आधार है। (अपरिष्कृत विचार पूर्वक सामाजिकता का निर्वाह संभव नहीं है। अमानवीयता की सीमा में विचार परिष्कृति संभव नहीं है। काम मूलक आर्थिक जीवन में अतिभोग के अतिरिक्त और कुछ सिद्ध नहीं हुआ है। कामुकता ही जीवन सर्वस्व नहीं है।) इसी सत्यतावश मानव जीवन सर्वस्व का अध्ययन करने के लिए बाध्य है। मानव जीवन सर्वस्व चार आयाम दश सोपानीय परिवार सभा व्यवस्था सीमानुवर्तीय है।
“संचेतनशीलता का पूर्ण उपयोग समाज में व्यवहार और व्यक्ति में अनुभूति है।” अनुभव विहीन आचरण पूर्ण नहीं है। मूल्य ही सत्य है। सत्य ही अनुभूति है। सामाजिक मूल्यानुभूति ही अखण्डता का और वस्तु मूल्यानुभूति ही समृद्धि का द्योतक है। वस्तु मूल्यानुभूति के बिना उसका उत्पादन संभव नहीं है। धर्मीयता का अनुभव हो जाना ही मूल्यानुभूति है। वस्तु मूल्यानुभूति ही उत्पादन, समृद्धि में सफलता है। यही आवश्यकता से अधिक उत्पादन की क्षमता है। मूल्यानुभूति में असमर्थता ही उत्पादन में अपूर्णता, सदुपयोग में अक्षमता एवं सुरक्षा में असमर्थता है। परिणामत: दरिद्रता एवं असामाजिकता है। व्यवहार मूल्य के अनुभव में जो अक्षमता है वही संदिग्धता, सशंकता, अविश्वास एवं भय है। फलत: मानव में आतंक, युद्ध एवं असहअस्तित्व है। इससे स्पष्ट होता है कि असामाजिकता के मूल में व्यवहार एवं व्यवसाय मूल्य का अनुभव