विहीन मानव का अपने में विश्वास एवं सम्मान पाना संभव नहीं है। मानवीयता पूर्ण जीवन में ही मूल्यांकन और मूल्यानुभूति होती है। मानवीयता पूर्ण जीवन में ही सहअस्तित्व सिद्ध होता है। यही मानव धर्म सहज सफलता है।
परंपरा किसी लक्ष्य को पाने के लिये किया गया प्रयास है। मानव व्यवहार परंपरा का मूल लक्ष्य सुख, शांति, संतोष एवं आनन्द ही है। इसका व्यवहार प्रमाण ही अभय, सहअस्तित्व, समाधान, समृद्धि है। यही अभयता है, जो समाज की मूल धारणा है। मूल धारणा को पाने के लिये अथवा सफल बनाने के लिये प्रक्रिया प्रभावशील होती है। मानवीयतापूर्ण प्रक्रिया ही लक्ष्य सफलता के लिये एकमात्र शरण है।
संस्कृति परंपरागत उद्बोधन, प्रयोजन, प्रोत्साहन, संरक्षण, संवर्धन, परिपालन प्रक्रिया सहित चेतना विकास मूल्य शिक्षा संस्कार है जो अवधारणा पूर्वक संस्कार का आरोपण करती है एवं अनुभव प्रमाण है। यही शिक्षा सर्वस्व है। संस्कार पूर्वक ही प्रवृत्तियों का उदय होता है। प्रत्येक प्रवृत्ति संवेग के रूप में अवतरित होकर क्रियाशील होती है। यही स्वभाव में गण्य होता है। स्वभाव “तात्रय” की सीमा में गण्य होता है।
“वर्ग विहीन मानवीयता पूर्ण समाज में संघर्ष का अत्याभाव होता है।” जागृति और संगठनपूर्वक ही समाज चेतना का परंपरा उदय होता है। संगठन के मूल में पूर्णता की धारणा व अध्ययन होता है। यही अभयता है।
“प्रत्येक समाज के मूल में अखण्डता सहज परंपरा में, से, के लिए स्थापक, ज्ञापक, प्रेरक का रहना अनिवार्य होता है।”
इन्हीं से उस परंपरा के अस्तित्व की महत्ता उसकी अक्षुण्णता के लिये कार्यक्रम उद्गमित होता है जो प्रत्यक्ष, परोक्ष आधार पर प्रतिस्थापित होता है। प्रत्यक्ष के स्थूल-सूक्ष्म कारण भेद हैं जो प्रकृति की सीमा है। परोक्ष के रहस्य एवं अरहस्य भेद हैं जो सहअस्तित्व में ज्ञानानुभूति परक हैं। इन्हीं आधारों पर संपूर्ण परंपरायें उद्गमित हुई है। प्रत्यक्ष के स्थूल रूप पर आधारित प्रस्तावनाओं से मानव जीवन को पूर्णतया विश्लेषित करना संभव नहीं हुआ है। मानव जीवन स्थूल, सूक्ष्म व कारण का संयुक्त रूप है। रहस्य के आधार पर प्रस्तावित किया गया जीवन दर्शन स्वयं में असंपूर्ण सिद्ध हुआ है। रहस्यता पूर्णता का द्योतक नहीं है। इसी पराभव ने मानव को प्रयोग, व्यवहार एवं अनुभव सिद्ध प्रमाणों पर आधारित जीवन दर्शन से परिपूर्ण होने के लिए बाध्य किया है जिसका