होना पाया जाता है। इस तथ्य से यह निर्ष्कष निकलता है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए जागृत परंपरा और शिक्षा का सुलभ होना आवश्यक है। तभी अखण्ड सामाजिकता, सहअस्तित्व सिद्ध होता है।
वर्गीयता को मानवीय चेतना में परिवर्तित करना मानव कुल के लिए वांछित घटना एवं अभीष्ट है। प्रत्येक स्थिति में मानव संस्कृति एवं सभ्यता की एकात्मकता ही इसका एक मात्र व्यावहारिक रूप है। इसे समृद्ध बनाने योग्य शिक्षा एवं व्यवस्था पद्धति की स्थापना ही मूल प्रक्रिया है, इसकी समानत: सभी व्यवस्था संस्थाओं में अर्थात् राज्यनैतिक एवं धर्मनैतिक में समान रूप हो जाना ही अभ्युदय है। यही व्यवहारिक समाधान का प्रमाण है। अनेक धर्म के स्थान में मानव धर्म का, अनेक जाति के स्थान पर मानव जाति का, अनेक राष्ट्र के स्थान पर अखण्ड समाज और भूमि का, रहस्यात्मक अनेक ईश्वर के स्थान पर व्यापक सत्ता रूपी ईश्वर का पूर्णतया बोध कराने वाली पद्धति से वर्गीयता मानवीय चेतना में परिणित होती है। यही व्यक्ति के जीवन में सार्वभौमिक आचरण, परिवार में सहयोग, समाज में प्रोत्साहन, राष्ट्र में संरक्षण-संवर्धन, अंतर्राष्ट्र में अनुकूल परिस्थितियाँ है। यही सर्वमंगल कार्यक्रम है, यही समृद्धि एवं समाधान है।