अनुसरण ही है। परंपरा और परस्परता ही संस्कार परिवर्तन का एक सशक्त कारण है। संस्कृति, सभ्यता, विधि, व्यवस्था का ध्रुवीकरण (स्थिरता) मानवीयता पूर्ण में, से, के लिए ही है। पूर्णता में स्पष्ट अर्थात् यथावत् विचार-व्यवहार परंपरा ही उत्थान का प्रत्यक्ष रूप है। गुणात्मक परिवर्तन के लिए प्राप्त प्रयोग अथवा प्रेरणा परंपरा ही संस्कारीयता है। सार्थक विचार के मूल में संस्कार का होना पाया जाता है। विचार की मूल प्रेरणा संस्कार है। संस्कार ही इच्छा व संकल्प के मूल में रहता है। अवधारणा बुद्धि में होती है, यही निष्ठा एवं संकल्प है। अवधारणा के पूर्व भास, आभास, प्रतीति होती है जो क्रम से मन, वृत्ति, चित्त में होती है। आत्मा में अनुभव होता है। यही चैतन्य जीवन है। यह प्रत्यावर्तन क्षमता पर्यन्त गुणात्मक जागृति के लिए प्रवृत्त है। इसी प्रेरणा वश मानव क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता को पाने के लिए चिरकाल से इच्छुक है। इसकी सफलता मानवीयता एवं अतिमानवीयता की सीमा में ही पाई जाती है।
सुसंस्कृति के आधार पर सुसंस्कारों का उदय घटनाओं में, से, के लिए सम्बद्ध है। प्रत्येक घटना प्रेरणादायी है। मानव में ही वातावरणस्थ क्रियाओं अर्थात् घटनाओं की संकेत ग्रहण एवं प्रसारण क्षमता प्रसिद्ध है। मानव जड़-चैतन्य का संयुक्त साकार रूप है। उसमें से जड़ शरीर का जन्म और मृत्यु स्पष्ट है। चैतन्य पक्ष का अमरत्व स्थापित सत्य है। गठनपूर्णता के अनन्तर प्रस्थापन एवं विस्थापन संभावना समाप्त हो जाती है। यही अमरत्व का प्रधान लक्षण है। मृत्यु घटना रासायनिक एवं भौतिक परिवर्तन ही है। गठन पूर्ण इकाई में उक्त दोनों प्रकार के परिवर्तन नहीं है, यही जीवन की प्रारंभिक स्थिति है। जीवन पूर्णता सजगता एवं सतर्कता में सम्पन्न होती है।
वातावरण से संस्कार में परिवर्तन योग्य जो प्रक्रियायें होती हैं वे इकाई के साथ होने वाली घटनाओं पर निर्भर करती है।
प्रत्येक मानव के जीवन में घटने वाली घटनायें गर्भ, जन्म, नामकरण, शिक्षा, दीक्षा, विवाह एवं मृत्यु के रूप में दृष्टव्य हैं। ये प्रत्येक घटनायें मानव में संस्कारों का निर्माण करती हैं अर्थात् मूल प्रवृत्तियों में परिवर्तन को स्थापित करती है। प्रत्येक मानव गर्भावस्था से ही संस्कार पूत होने के लिये प्रवृत्त है। जीवन एवं जीवन गति में संस्कार ही प्रत्यक्ष होता हुआ देखा जाता है। जीवन परिष्कृति के लिये संस्कारों में गुणात्मक परिवर्तन आवश्यक एवं अनिर्वाय है। गुणात्मक परिवर्तन पूर्वक ही क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता सिद्ध होता है। सुसंस्कार परिचय इसी सीमा में चरितार्थ होता है जिसके लिए प्रत्येक मानव प्यासा है। ये सुसंस्कार अर्थात् मानवीयता एवं अतिमानवीयतापूर्ण जीवन प्रदायी प्रेरणा परंपरा ही मानवीय संस्कृति है, जो मानव से मानव को