“विकास योग्य कार्यक्रम से सम्पन्न होना ही गुणात्मक परिवर्तन है।” यही मूल प्रवृत्तियों में विशिष्टता की स्थापना है। मूल प्रवृत्तियों की परावर्तन प्रक्रिया ही व्यवहार एवं उत्पादन में मधुरता है। चैतन्य क्रिया में ही भास, आभास, प्रतीति, अवधारणा एवं अनुभूति होती है न कि जड़
क्रिया में। अनुभव योग्य क्षमता का निर्माण ही गुणात्मक परिवर्तन की क्रमोपलब्धि है। अनुभव के बिना व्यवहार कुशल होना नहीं पाया जाता। उत्पादन में भी अनुभव रहता है। व्यवहार में अनुभव प्रधान है। सभी मूल्य अनुभव में ही प्रमाणित हैं। अनुभव प्रमाण ही क्रम से व्यवहार एवं प्रयोग में उद्घाटित होता है। अनुभव पूर्वक उद्घाटन (व्यवहारिक एवं उत्पादन विनिमय) पूर्णतया सामाजिकता, सर्वदा समृद्धि एवं समाधान है। यह जागृति पूर्वक प्रमाणित होता है।
भ्रांत पद चक्र से देव पद चक्र में संक्रमित होते समय मानव के संक्रमण का आधार केवल मानवीयता पूर्ण संस्कार व संस्कृति ही है। मानवीयता से परिपूर्ण हो जाना ही देव पद चक्र में अवस्थिति है। इस अवस्थिति के अनन्तर ही मानवीय सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था सहज निरंतरता है। यही सर्व स्वर्गीयता है। इसे पाने के लिये ही अशेष मानव आतुर-कातुर एवं आकुल-व्याकुल है। इसे सफल बनाने की दिशा में प्रथम शिक्षा, द्वितीय विधि, तृतीय व्यवस्था, चतुर्थ संस्कृति एवं सभ्यता का प्रमाण ही मानवीय संस्कृति की स्थापना है। मानवीय संस्कृति की स्थापना ही देव पद चक्र में संक्रमण पूर्वक पद स्थिति है। इससे सुस्पष्ट हो जाता है कि मानव प्रबुद्धता पूर्वक ही मानवीयता एवं अतिमानवीयता को सहज सुलभ कर लेता है। यही जागृति की गरिमा, नियति की अक्षुण्णता है। यही जीवन में सफलता है।
“भ्रांतिपद चक्र में समस्या का अभाव नहीं है।” समस्यायें मानव की वांछित उपलब्धि नहीं है। समस्याएं समृद्धि की द्योतक नहीं है। भ्रांत पद चक्र में मानव का परिवर्तन शक्तियों के अपव्यय पूर्वक ह्रास होने में भावी है। फलत: जीवावस्था में अवस्थित होना होता है। भ्रांति पद चक्र में जीवन विकास क्रम पूर्वक भ्रांत मानव पद को प्राप्त करता है। यही भ्रांत मानव ह्रास पूर्वक जीव पद को पा लेता है। यही भ्रांति पद चक्र का तात्पर्य है। इस चक्र पर्यन्त जीवन में समाधान, सतर्कता, सामाजिकता, अभयता एवं समृद्धि सिद्ध नहीं होती है क्योंकि अपव्ययता के कारण कितनी ही संपत्ति क्यों न हो उसमें समृद्धि का भाव नहीं होता है जबकि अभावता मानव के लिये वांछित तथ्य नहीं है। अभाव को भाव में परिवर्तित करने के लिए प्रत्येक मानव का अजस्र प्रयास है। यह प्रयास मानवीयता पूर्वक ही सफल होता है। भ्रांति पूर्वक सदुपयोग सिद्ध होना संभव नहीं है। साथ ही मानवीयता सहज विधि से अपव्यय सर्वथा असंभव है। सद्व्ययता ही अभाव का अभाव है। अभाव का अभाव ही चिरवांछित संतोष है। सम्यकता का तात्पर्य पूर्ण तोष से है। पूर्ण तोष ही पूर्ण तृप्ति है जिसमें संशय, विपर्यय एवं भय का अत्याभाव है। भ्रांतिपद चक्र में संतोष होना संभव नहीं है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मानव का मानवीय संस्कृति, विधि,