रखने से सुगम प्रकाश, सुखद वायु, मधुर संभाषण की व्यवस्थिति का निर्माण करने से जन्म समय में उत्तम संस्कार स्थापित होता है।
“नामकरण संस्कार प्रसिद्ध है।” नाम विहीन मानव नहीं है। नामकरण व्यवहार के लिए एक अनिवार्यतम घटना है। नामकरण प्रक्रिया में माता-पिता के अतिरिक्त अन्य कुटुब परिवार बन्धुओं की सम्मति रहती है। जो स्वयं में एक ज्ञापन प्रक्रिया है। इस सम्मति के साथ ही शुभ कामना का होना पाया जाता है। स्वयं के संबोधन के लिए नामकरण प्रक्रिया है। शुद्धत: मानव का मूल रूप चैतन्य क्रिया है। चैतन्य क्रिया के साथ स्थूल शरीर का संयोग होना ही जन्म घटना होती है। इसी मूल कारणवश नामकरण परंपरा है। शिशु के नामकरण के समय में शुभकामनाएं एवं वातावरण सहायक तत्व है। शुभकामनाएं एवं वातावरण परस्पर सुखप्रद होता है, जो प्रत्यक्ष है। प्रधानत: चैतन्य क्रिया को इंगित कराने वाला नाम शुभद होता है। अन्ततोगत्वा स्वयं के बोध एवं अनुभव में ही नाम चरितार्थ होता है। यह देखा जाता है कि नामकरण के कुछ समय पश्चात् ही शिशु उस नाम के साथ स्वयं के संबोधन को स्वीकारता हुआ देखा जाता है, जो सर्वविदित तथ्य है। यह सत्यता स्पष्ट करती है कि तादात्म्य तदाकार योग्य-योग्यता शैशवावस्था से ही समायी रहती है। पूर्ण स्वीकृति ही अनन्यता है, जो प्रत्येक मानव के नाम में स्पष्ट होती है। जो परम विशिष्ट प्रक्रिया है। यही अनुभव क्षमता का द्योतक है, और संकेतग्राही क्षमता का लक्षण है। यही क्रम से शिष्टता को प्रकट करने का मूल तत्व है। इस अनन्यता योग्य क्षमता को शुभ नाम संबोधन उद्दीप्त करता है अर्थात् प्रखर बनाता है। अनन्यता ही प्रधान शिष्टता है, जो प्रेम को अभिव्यंजित करने में समर्थ है। प्रेम ही जीवन में पूर्ण मूल्य है। प्रेममयता ही अभयता का अनुभव है। यह संबोधन क्रम से स्थापित संबंधों को ज्ञात कराता है। प्रत्येक संबंध में स्थापित मूल्य प्रसिद्ध है। प्रत्येक संबंध की चरितार्थता केवल अभयता एवं अनिवार्यता ही है। जो जीवन का लक्ष्य है। प्रत्येक चैतन्य इकाई जीवन घटना में लक्ष्य को साधना चाहती है। इसी महत्वपूर्ण भूमिका का आरम्भ नामकरण से होता है। अस्तु, मानवीयता का प्रबोधन उद्बोधन करने का आधार भी नाम ही है। जीवन में प्रमाण सिद्धि या प्रमाणिकता को उद्दीप्त एवं प्रकट करने के लिए आधार केवल नाम ही है। नामकरण संस्कार जीवन सहज कार्यक्रम में एक कड़ी है।
“मानव जीवन में गुणात्मक जागृति के लिए शिक्षा-संस्कार प्रसिद्ध है।” गुणात्मक विकास के लिए प्रेरणा प्रदान करने का कार्यक्रम पद्धति नीति, वस्तु, विषय, प्रणाली एवं प्रक्रिया ही मानव जीवन में शिक्षा-संस्कार का प्रत्यक्ष रूप है। यह क्रम से माता-पिता, परिवार, संपर्क, संबंध,